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सीढ़ियों से उतरते वक्त जो रौब था, वो काबिले तारीफ है। पीछे खड़े गुंडे भी सरदार के इशारे पर चल रहे हैं। सामने वाली नायिका भी किसी से कम नहीं लग रही। मेरा वारलॉर्ड हसबैंड फिर से आया! की लोकप्रियता का राज यही है। हॉल का माहौल बहुत ही डरावना और खूबसूरत है। ऐसे ड्रामे देखकर वक्त का पता नहीं चलता।
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