वीरेंद्र राठौर का आगमन देखकर रोंगटे खड़े हो गए। घोड़े पर सवार होकर जब वो सामने आए, तो लगा जैसे युद्ध जीतना तय है। शूरवीर: मातृभूमि का रक्षक में युद्ध के दृश्य बहुत दमदार हैं। सूरज ढलने का नज़ारा और सेना का जोश देखने लायक है। काश ऐसे योद्धा हर दौर में होते। वीरेंद्र की आँखों में देशभ्रेम साफ दिख रहा था।
श्वेता चौहान का किरदार बहुत मजबूत लगा। तलवार हाथ में होते ही उनका रौद्र रूप देखने को मिला। शूरवीर: मातृभूमि का रक्षक में महिला योद्धाओं को जिस तरह दिखाया गया है वो प्रेरणादायक है। वो सिर्फ साथ खड़ी नहीं हैं बल्कि खुद लड़ने को तैयार हैं। उनकी आँखों में आँसू और इरादों में सख्ती थी। दिल को छू गया।
गाँव का माहौल बहुत शांत था लेकिन विक्रम सिंघानिया के आगमन ने सब बदल दिया। उसकी चाल में घमंड साफ झलक रहा था। शूरवीर: मातृभूमि का रक्षक में खलनायक का आगमन भी धमाकेदार है। नंदिनी राठौर की चिंता देखकर बुरा लगा। लगता है अब मुसीबतें बढ़ने वाली हैं। क्या वीरेंद्र समय पर वापस आ पाएंगे?
चाय पीते हुए अधिकारी की चिंता देखकर लगा कि कोई साजिश रची जा रही है। शूरवीर: मातृभूमि का रक्षक में राजनीति और युद्ध का मिश्रण बहुत अच्छा है। रुद्र राव की वफादारी भी सवाल के घेरे में लग रही है। हर किरदार की अपनी मजबूरी है। कहानी में गहराई है जो बार-बार देखने पर मजबूर करती है।
नंदिनी राठौर और सुशीला शर्मा का रिश्ता बहुत प्यारा लगा। सादगी में ही असली खुशी है। शूरवीर: मातृभूमि का रक्षक में परिवार के पलों को बहुत खूबसूरती से दिखाया गया है। लेकिन बाहर का खतरा मंडरा रहा है। क्या ये शांति बनी रहेगी? विक्रम की नज़रें नंदिनी पर थीं जो खतरे की घंटी है।
घोड़े की रफ़्तार और तलवार की चमक देखकर रोमांच बढ़ गया। वीरेंद्र राठौर का हुनर बेमिसाल है। शूरवीर: मातृभूमि का रक्षक में लड़ाई की बनावट बहुत शानदार है। धूल उड़ती है और दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है। ऐसे दृश्य बड़े पर्दे पर देखने का मज़ा ही अलग है। इस मंच पर कहानी का स्तर ऊंचा है।
रुद्र राव का किरदार थोड़ा रहस्यमयी लगा। वो वीरेंद्र राठौर के साथ हैं या खिलाफ? शूरवीर: मातृभूमि का रक्षक में हर मोड़ पर नया बदलाव है। सेनापति की आँखों में कुछ छुपा है। कहानी आगे बढ़ने के साथ सब साफ होगा। सस्पेंस बनाए रखना आसान नहीं है पर ये श्रृंखला कर रही है।
छायांकन कमाल की है। सूरज की रोशनी में सेना का चलना किसी पेंटिंग जैसा लग रहा था। शूरवीर: मातृभूमि का रक्षक के दृश्यों पर बहुत मेहनत की गई है। रंगों का इस्तेमाल मूड के हिसाब से बदलता है। युद्ध के मैदान का माहौल बिल्कुल असली लगता है। देखने वाला बस देखता ही रह जाता है।
विक्रम सिंघानिया की चालाकी देखकर गुस्सा आ रहा है। अमीर घर का होने का घमंड उसे अंधा कर रहा है। शूरवीर: मातृभूमि का रक्षक में विलेन कितना भी ताकतवर हो, सच्चाई जीतती है। नंदिनी राठौर की मासूमियत को ठेस पहुंचाना उसे भारी पड़ेगा। बदला लेने का समय आएगा।
पूरी श्रृंखला में देशभक्ति और परिवार का जज़्बात बराबर बहा है। वीरेंद्र राठौर जैसे योद्धाओं की वजह से हम सुरक्षित हैं। शूरवीर: मातृभूमि का रक्षक देखकर गर्व महसूस हुआ। आगे क्या होगा ये जानने की बेचैनी बढ़ रही है। जल्दी नई कड़ी आए। सबको इस मंच पर ज़रूर देखना चाहिए।