जब भी कोई बड़ा मामला होता है, तो पत्रकारों का झुंड ऐसे टूट पड़ता है जैसे शिकार ढूंढ रहे हों। इस दृश्य में भी वही माहौल था। कैमरे, माइक, सवालों की बौछार - सब कुछ इतना तेज़ था कि दर्शक भी सांस रोके देख रहा था। लेकिन लाल पोशाक वाली महिला ने सबको चुप करा दिया। न्याय की राह में कोई रुकावट नहीं आ सकती।
उस महिला के चलने का तरीका, बात करने का ढंग, यहाँ तक कि चुप रहने का अंदाज़ भी इतना प्रभावशाली था कि लगता था जैसे वह पूरी दुनिया को अपने कदमों में देख रही हो। जब वह सीढ़ियों से उतरकर आगे बढ़ी, तो ऐसा लगा जैसे न्याय स्वयं चल रहा हो। उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी शांति थी।
हर सवाल का जवाब देते समय उसकी आवाज़ में कोई कंपन नहीं था। जैसे वह पहले से ही सब कुछ तैयार करके आई हो। पत्रकारों के सवाल कितने भी कठिन क्यों न हों, वह हर बार मुस्कुराकर जवाब देती रही। यह दृश्य देखकर लगता है कि न्याय की राह में सच्चाई ही सबसे बड़ा हथियार है।
लाल रंग हमेशा से ही शक्ति और साहस का प्रतीक रहा है। इस दृश्य में भी वह महिला लाल पोशाक में इतनी आत्मविश्वास से खड़ी थी कि लगता था जैसे वह न्याय की देवी हो। उसके चेहरे पर कोई डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी मुस्कान थी। जैसे वह जानती हो कि आज उसकी जीत निश्चित है।
कोर्ट के बाहर का यह दृश्य किसी फिल्म से कम नहीं लग रहा था। पत्रकार, कैमरे, सवाल और एक महिला जो सबका सामना अकेले कर रही थी। उसकी आँखों में वह चमक थी जो केवल जीतने वालों में होती है। न्याय की राह में ऐसे ही पलों का इंतज़ार होता है जब सच्चाई सामने आती है।