वैद्य की मुक्ति में कोर्ट का माहौल इतना तनावपूर्ण है कि सांस रुक जाती है। बूढ़े पिता का रोना और बेटी का बेहोश होकर गिरना दिल को चीर देता है। पुलिस वाले शख्स की आंखों में छिपा दर्द और वकील की गंभीरता हर फ्रेम में महसूस होती है। नेटशॉर्ट ऐप पर यह सीन देखते वक्त लगा जैसे मैं भी वहीं खड़ा हूं। इमोशनल ड्रामा का असली मजा यहीं है।