वह रसोई में गई, पानी डाला, फिर चाय का कप उठाया। हर हरकत में एक थकान थी, जैसे रात भर जागकर सोचा हो। कप को दोनों हाथों से पकड़ना, फिर धीरे से पीना—ये सब छोटे-छोटे पल बता रहे थे कि कुछ टूट गया है। वह गई, बर्फ़ गिरी, और सुबह भी ठंडी लग रही थी।
उसने जो किताब पकड़ रखी थी, शायद उसमें उसकी अपनी कहानी लिखी थी। जब वह पास आया, तो उसने किताब को सीने से लगा लिया, जैसे कोई सुरक्षा कवच हो। आँखों में डर था, पर चेहरे पर शांति। वह गई, बर्फ़ गिरी, और पन्ने पलटने की आवाज़ भी रुक गई।
दोनों एक ही चादर में थे, पर कोई छू नहीं रहा था। वह करवट बदलती रही, वह आसमान की तरफ देखता रहा। साँसें तो चल रही थीं, पर बातें नहीं। वह गई, बर्फ़ गिरी, और रात भर की चुप्पी सुबह तक जमी रही।
वह रसोई में गई, जैसे कोई रस्म निभा रही हो। पानी डालना, कप उठाना, फिर धीरे से पीना—सब कुछ मशीनी लग रहा था। चेहरे पर कोई भाव नहीं, बस एक खालीपन। वह गई, बर्फ़ गिरी, और रसोई की रोशनी भी फीकी पड़ गई।
जब वह उसके पास आया, तो उसकी आँखों में एक सवाल था—'क्यों?' पर वो सवाल जुबां तक नहीं आया। बस किताब को सीने से लगा लिया, जैसे जवाब वहीं छिपा हो। वह गई, बर्फ़ गिरी, और सवाल हवा में लटकता रह गया।
चादर गर्म थी, पर दोनों के बीच की हवा ठंडी थी। वह करवट बदलती रही, वह आँखें बंद किए लेटा रहा। कोई बात नहीं, कोई स्पर्श नहीं। वह गई, बर्फ़ गिरी, और रात भर की ठंडक सुबह तक बनी रही।
जब उसने किताब बंद की, तो एक अजीब सी आवाज़ हुई—जैसे कोई दरवाज़ा बंद हो रहा हो। उसकी आँखों में डर था, पर चेहरे पर मुस्कान नहीं। वह गई, बर्फ़ गिरी, और किताब के पन्नों के बीच की कहानी अधूरी रह गई।
वह रसोई में गई, जैसे सुबह की पहली किरण हो। पर उसके चेहरे पर कोई रोशनी नहीं थी। कप को पकड़ना, फिर धीरे से पीना—ये सब बता रहे थे कि उम्मीदें टूट चुकी हैं। वह गई, बर्फ़ गिरी, और सुबह भी शाम जैसी लग रही थी।
एक ही छत के नीचे, दो दिल अलग-अलग धड़क रहे थे। वह किताब पढ़ रही थी, वह आसमान देख रहा था। कोई बात नहीं, कोई छू नहीं रहा था। वह गई, बर्फ़ गिरी, और दूरियाँ और भी गहरी हो गईं।
बिस्तर पर लेटे दोनों के बीच की दूरी सिर्फ चादर की नहीं, बल्कि दिलों की भी लगती है। वह किताब पढ़ रही थी, पर उसकी आँखों में नींद नहीं, बस एक गहरा सवाल था। जब वह पास आया, तो उसने किताब बंद कर दी, जैसे कोई राज़ छिपा रही हो। वह गई, बर्फ़ गिरी, और कमरे में ठंडक छा गई।