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वह गई, बर्फ़ गिरीवां37एपिसोड

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वह गई, बर्फ़ गिरी

पाँच साल पहले, सिमरन की बहन साक्षी ने शादी से इनकार कर दिया था, तो सिमरन को “मुआवज़ा” बनाकर रुद्र ग्रुप के वारिस रुद्र को दे दिया गया। पाँच साल बाद साक्षी वापस आई तो रुद्र उसके पीछे भागने लगा। तब सिमरन को समझ में आया कि पाँच साल का साथ भी उसे रुद्र का दिल नहीं दिला सका। दिल टूटने के बाद सिमरन ने साक्षी से “बदली शादी” का प्रस्ताव रखा और रुद्र के घर से निकलने का फैसला कर लिया। लेकिन जब रुद्र को पता चला कि उससे शादी करने वाली सिमरन नहीं थी, तब उसे एहसास हुआ कि उसके दिल में सिमरन की जगह पहले से थी।
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इस एपिसोड की समीक्षा

सुबह की चाय और अनकही बातें

वह रसोई में गई, पानी डाला, फिर चाय का कप उठाया। हर हरकत में एक थकान थी, जैसे रात भर जागकर सोचा हो। कप को दोनों हाथों से पकड़ना, फिर धीरे से पीना—ये सब छोटे-छोटे पल बता रहे थे कि कुछ टूट गया है। वह गई, बर्फ़ गिरी, और सुबह भी ठंडी लग रही थी।

किताब के पन्नों में छिपी कहानी

उसने जो किताब पकड़ रखी थी, शायद उसमें उसकी अपनी कहानी लिखी थी। जब वह पास आया, तो उसने किताब को सीने से लगा लिया, जैसे कोई सुरक्षा कवच हो। आँखों में डर था, पर चेहरे पर शांति। वह गई, बर्फ़ गिरी, और पन्ने पलटने की आवाज़ भी रुक गई।

बिस्तर पर दो शरीर, एक दूरी

दोनों एक ही चादर में थे, पर कोई छू नहीं रहा था। वह करवट बदलती रही, वह आसमान की तरफ देखता रहा। साँसें तो चल रही थीं, पर बातें नहीं। वह गई, बर्फ़ गिरी, और रात भर की चुप्पी सुबह तक जमी रही।

रसोई का कोना और टूटी उम्मीद

वह रसोई में गई, जैसे कोई रस्म निभा रही हो। पानी डालना, कप उठाना, फिर धीरे से पीना—सब कुछ मशीनी लग रहा था। चेहरे पर कोई भाव नहीं, बस एक खालीपन। वह गई, बर्फ़ गिरी, और रसोई की रोशनी भी फीकी पड़ गई।

आँखों में छिपा सवाल

जब वह उसके पास आया, तो उसकी आँखों में एक सवाल था—'क्यों?' पर वो सवाल जुबां तक नहीं आया। बस किताब को सीने से लगा लिया, जैसे जवाब वहीं छिपा हो। वह गई, बर्फ़ गिरी, और सवाल हवा में लटकता रह गया।

चादर के नीचे की ठंडक

चादर गर्म थी, पर दोनों के बीच की हवा ठंडी थी। वह करवट बदलती रही, वह आँखें बंद किए लेटा रहा। कोई बात नहीं, कोई स्पर्श नहीं। वह गई, बर्फ़ गिरी, और रात भर की ठंडक सुबह तक बनी रही।

किताब बंद करने की आवाज़

जब उसने किताब बंद की, तो एक अजीब सी आवाज़ हुई—जैसे कोई दरवाज़ा बंद हो रहा हो। उसकी आँखों में डर था, पर चेहरे पर मुस्कान नहीं। वह गई, बर्फ़ गिरी, और किताब के पन्नों के बीच की कहानी अधूरी रह गई।

सुबह की पहली किरण और आखिरी उम्मीद

वह रसोई में गई, जैसे सुबह की पहली किरण हो। पर उसके चेहरे पर कोई रोशनी नहीं थी। कप को पकड़ना, फिर धीरे से पीना—ये सब बता रहे थे कि उम्मीदें टूट चुकी हैं। वह गई, बर्फ़ गिरी, और सुबह भी शाम जैसी लग रही थी।

दो दिल, एक छत, अनगिनत दूरियाँ

एक ही छत के नीचे, दो दिल अलग-अलग धड़क रहे थे। वह किताब पढ़ रही थी, वह आसमान देख रहा था। कोई बात नहीं, कोई छू नहीं रहा था। वह गई, बर्फ़ गिरी, और दूरियाँ और भी गहरी हो गईं।

रात की चुप्पी में छिपा दर्द

बिस्तर पर लेटे दोनों के बीच की दूरी सिर्फ चादर की नहीं, बल्कि दिलों की भी लगती है। वह किताब पढ़ रही थी, पर उसकी आँखों में नींद नहीं, बस एक गहरा सवाल था। जब वह पास आया, तो उसने किताब बंद कर दी, जैसे कोई राज़ छिपा रही हो। वह गई, बर्फ़ गिरी, और कमरे में ठंडक छा गई।