इस दृश्य में तीन बेघर लोगों की पीड़ा और एक कसरत करने वाली लड़की की उदासीनता दिल को झकझोर देती है। खाक हुआ इश्क़ की तरह यह कहानी भी समाज के विरोधाभासों को दिखाती है। जब वे भूख से तड़प रहे थे, तब वह सिर्फ खड़ी थी। यह दृश्य मानवता की कमी पर सवाल उठाता है।
एक तरफ फटे हुए कपड़े और गंदगी, दूसरी तरफ साफ सुथरा खेल परिधान। यह दृश्य विरोधाभास बहुत गहरा है। खाक हुआ इश्क़ में भी वर्ग अंतर ऐसे ही दिखाया गया था। लड़की का चेहरा पत्थर जैसा है, जैसे उसे इनकी भूख दिखाई ही नहीं दे रही। क्या अमीर होना इतना बेरहम बना देता है?
तीनों के चेहरे पर भूख का दर्द साफ दिख रहा है। लड़का और दोनों लड़कियां पेट पकड़कर खड़ी हैं। खाक हुआ इश्क़ के गानों जैसी पीड़ा इनकी आंखों में है। लेकिन सामने खड़ी लड़की को शायद इनकी भूख समझ नहीं आ रही। यह दृश्य समाज की बेरुखी पर एक तमाचा है।
इस दृश्य में संवाद नहीं, बस चेहरे बोल रहे हैं। बेघर लोगों की आंखों में उम्मीद और लड़की की आंखों में अजीब सी खालीपन। खाक हुआ इश्क़ की तरह यह भी एक मौन नाटक है। कैमरा कोण और अभिनय ने इसे और भी भावनात्मक बना दिया है।
कचरे के डिब्बे के पास खड़े ये लोग समाज के लिए कचरा हैं? लड़की का व्यवहार और इनकी हालत देखकर गुस्सा आता है। खाक हुआ इश्क़ में भी ऐसे ही सामाजिक मुद्दे उठाए गए थे। यह दृश्य हमें सोचने पर मजबूर करता है कि हम कितने संवेदनशील हैं।