कबीर का आत्मविश्वास देखकर लग रहा था जीत पक्की है, लेकिन दौड़ में ऐसा मोड़ आएगा किसी ने नहीं सोचा था। धूल के तूफान में अनन्या का संघर्ष दिल को छू गया। (पृष्ठध्वनि) बहको, कार धोने वाले चाचा में ऐसे ही जोरदार नाटक की उम्मीद थी। अनुकारक की सीटें हिल रही थीं जैसे असली दौड़ हो। दर्शकों की सांसें थम गई थीं और सब हैरान थे। सच में बहुत अच्छा लगा।
अनन्या जब कहती है कि आगे कुछ दिख नहीं रहा, तो तनाव अपने चरम पर पहुंच जाती है। कबीर का ध्यान भटकाने की कोशिशें नापाक हैं। इस शो में हर पल नया रहस्य है। (पृष्ठध्वनि) बहको, कार धोने वाले चाचा का यह एपिसोड सबसे बेस्ट है। खेल सेटअप भी बहुत पेशेवर लगा। पीछे खड़े लोग भी हैरान थे और तालियां बजा रहे थे। सबको मजा आया।
चौकोर सूट वाले शख्स की प्रतिक्रियाएं कमाल की थीं। जब गुलाबी कार ने आगे निकलना किया तो सबकी सांसें रुक गईं। कबीर और अनन्या का मिलान देखने लायक है। (पृष्ठध्वनि) बहको, कार धोने वाले चाचा में भावनात्मक गहराई भी है। दौड़ के गियर की आवाजें यथार्थवादी थीं। माहौल बहुत तनावपूर्ण था और सब देख रहे थे। बहुत पसंद आया।
गुलेल प्रभाव वाला दृश्य देखकर रोंगटे खड़े हो गए। कबीर ने अपनी कमजोरी को ताकत में बदल दिया। दर्शकों की आंखें फटी की फटी रह गईं। (पृष्ठध्वनि) बहको, कार धोने वाले चाचा जैसी कथा बारबार देखने को मिले। संवाद वितरण बहुत स्वाभाविक था। हर कोई स्क्रीन से चिपका था और मजा ले रहा था। सच में कमाल था।
जो लड़का पार्ट्स अनलिमिटेड की वर्दी पहने था, उसका संवाद बहुत भारी था। तुमने हमें हल्का समझ लिया था। कबीर पर इसका गहरा असर हुआ। (पृष्ठध्वनि) बहको, कार धोने वाले चाचा में ऐसे ही चुटकुले मिलते हैं। अनुकारक दौड़ का क्रेज बढ़ गया है। जीत की चाहत साफ दिख रही थी सबके चेहरे पर। सबको पसंद आया।
धूल भरे रास्ते में कार का फिसलना और फिर संभलना आसान नहीं था। अनन्या की पकड़ ढीली पड़ रही थी लेकिन हारी नहीं। कबीर का सहयोग प्रणाली बना रहा। (पृष्ठध्वनि) बहको, कार धोने वाले चाचा के प्रशंसकों को यह पसंद आएगा। दृश्य बहुत स्पष्ट और तेज थे। दौड़ का हर मोड़ रोमांचक था और दिल धक धक हो रहा था। मजा आ गया।
शुरू में लगा कबीर अकेला ही सब संभाल लेगा, फिर सहयोग की अहमियत समझ आई। चेहरे के भाव हर बात कह रहे थे। (पृष्ठध्वनि) बहको, कार धोने वाले चाचा में मोड़ की कमी नहीं है। स्टूडियो की प्रकाश व्यवस्था बहुत नाटकीय थी। पीछे खड़े दोस्त भी चिंतित थे और दुआ कर रहे थे। सबको पसंद आया।
जब कबीर को कहा गया कि ध्यान मत भटकाओ, तो माहौल गंभीर हो गया। दौड़ सिर्फ गाड़ी की नहीं, दिमाग की भी थी। (पृष्ठध्वनि) बहको, कार धोने वाले चाचा में ऐसे ही मानसिक खेल देखने को मिलते हैं। अभिनय में दम था। जीतने का जूनून हर पल दिख रहा था और सब देख रहे थे। बहुत अच्छा लगा।
पहिया को पकड़ने का तरीका बता रहा था कि ये पेशेवर खिलाड़ी हैं। हारने का डर नहीं, जीतने का जूनून था। (पृष्ठध्वनि) बहको, कार धोने वाले चाचा की वजह से मैंने अनुकारक खरीद लिया। कहानी में जान थी। कबीर का ध्यान देखने लायक था और सबको पसंद आया। सच में कमाल था।
अंत में जो संवाद बोला गया कि मैं अब कभी नहीं कहूंगा तुम किसी काम के नहीं हो, वो रूह कंपा देने वाला था। कबीर की आंखों में आंसू थे। (पृष्ठध्वनि) बहको, कार धोने वाले चाचा ने भावुक कर दिया। यह दृश्य लंबे समय तक याद रहेगा। दोस्ती की जीत हुई थी और सब खुश थे। बहुत पसंद आया।