इस दृश्य में तनाव इतना ज्यादा है कि सांस रुक जाती है। लिसा का व्यवहार देखकर गुस्सा आता है, वह दवाइयों को ऐसे उड़ा रही है जैसे कोई खेल हो। जबकि जमीन पर पड़ी महिला की हालत देखकर दिल दहल जाता है। पहचान गलत, सज़ा बराबर जैसे शो में इतनी क्रूरता कम ही देखी गई है। वह महिला जो मदद मांग रही है, उसे ठुकरा दिया गया। यह सिर्फ एक झगड़ा नहीं, बल्कि इंसानियत का गला घोंटना है।
वह पाउडर कंटेनर जिससे लिसा खेल रही है, वह सिर्फ एक प्रॉप नहीं बल्कि शक्ति का प्रतीक है। वह जानबूझकर उसे गिराती है और फिर पैरों से कुचलती है। यह दृश्य सज़ा बराबर के सबसे यादगार सीन्स में से एक हो सकता है। सामने खड़ी दूसरी महिला की हंसी और भी चौंकाने वाली है। वे दोनों मिलकर उस बेचारी को तोड़ रही हैं जो पहले से ही टूट चुकी है। यह मनोवैज्ञानिक यातना किसी अपराध से कम नहीं लगती।
जैसे ही काले सूट वाले बॉडीगार्ड्स चलते हुए आते हैं, माहौल बदल जाता है। लगता है अब कुछ बड़ा होने वाला है। लिसा की घबराहट साफ दिख रही है, उसे अहसास हो गया है कि उसने हद पार कर दी है। पहचान गलत, सज़ा बराबर में अक्सर ऐसे ट्विस्ट आते हैं जो रोंगटे खड़े कर देते हैं। जमीन पर पड़ी महिला की आंखों में अब उम्मीद की किरण दिख रही है। क्या ये लोग उसे बचाने आए हैं या स्थिति और बिगाड़ने?
शुरुआत में लिसा जिस तरह से घमंड में चूर थी, वह काबिले तारीफ अभिनय था। उसने दवाइयों को हवा में उछाला और हंसी, लेकिन जब उसे एहसास हुआ कि स्थिति उसके काबू से बाहर है, तो उसका चेहरा पीला पड़ गया। सज़ा बराबर के इस एपिसोड में पात्रों के बीच की रसायन बहुत गहरी है। वह लकड़ी का टुकड़ा उठाकर हमला करने वाली थी, लेकिन समय रहते रुक गई। यह डर और गुस्से का मिश्रण देखने लायक था।
उस महिला की चीख जो जमीन पर पड़ी है, सीधे दिल में उतर जाती है। उसके चेहरे पर मिट्टी और आंसू हैं, लेकिन उसकी आंखों में जीने की जिद है। पहचान गलत, सज़ा बराबर में ऐसे इमोशनल सीन्स बहुत कमाल के होते हैं। जब लिसा उसके पास से गुजरती है तो उसकी उपेक्षा सबसे बड़ा हथियार बन जाती है। यह दृश्य दिखाता है कि कैसे शक्ति का दुरुपयोग कमजोरों को कुचल सकता है। बहुत ही दिल दहला देने वाला सीन है।
वह महिला जो काले जैकेट में है और लिसा के साथ खड़ी है, उसका रोल बहुत संदिग्ध लग रहा है। वह हंस रही है जबकि सामने एक इंसान तड़प रहा है। सज़ा बराबर में ऐसे विलेन किरदार अक्सर कहानी को नया मोड़ देते हैं। उसकी हंसी में एक अजीब सा क्रूरता है जो लिसा से भी ज्यादा खतरनाक लगती है। लगता है यह दोनों मिलकर कोई बड़ी साजिश रच रहे हैं। उसकी आंखों में चमक और होंठों पर मुस्कान सब कुछ बता रही है।
जब लिसा दवाइयों की गोलियों को जमीन पर गिराती है और फिर उन्हें पैरों से कुचलती है, तो वह सिर्फ दवा नहीं तोड़ रही, बल्कि उस महिला की उम्मीदें तोड़ रही है। पहचान गलत, सज़ा बराबर के इस सीन में प्रतीकात्मकता बहुत गहरी है। वह महिला जो उन गोलियों के लिए तरस रही है, उसे मिट्टी में मिला दिया गया। यह दृश्य दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि इंसान इंसान के साथ ऐसा क्यों करता है? बहुत ही गहरा और विचारोत्तेजक दृश्य।
जो आदमी सबसे आगे चल रहा है, उसके चेहरे पर गंभीरता साफ झलक रही है। लगता है वह इस पूरे मामले का मालिक या बॉस है। सज़ा बराबर में ऐसे पात्रों की एंट्री हमेशा कहानी में भूचाल लाती है। लिसा और उसकी साथी अब घबरा गई हैं क्योंकि उन्हें पता है कि अब उनका सामना किससे होने वाला है। जमीन पर पड़ी महिला की नजरें भी उसी आदमी पर टिकी हैं। क्या वह उसका रक्षक बनेगा या भक्षक? यह सस्पेंस बना हुआ है।
उस महिला का चेहरा जो मिट्टी और पसीने से सना हुआ है, एक कहानी कह रहा है। उसने क्या सहन किया है, यह शब्दों में बयां करना मुश्किल है। पहचान गलत, सज़ा बराबर के मेकअप और विजुअल्स बहुत रियलिस्टिक हैं। जब वह लिसा के पैरों को पकड़ने की कोशिश करती है, तो उसकी मजबूरी साफ दिखती है। यह दृश्य समाज में हो रहे भेदभाव और अहंकार का आईना है। दर्शक के रूप में यह देखना बहुत तकलीफदेह है लेकिन जरूरी भी।
जैसे-जैसे बॉडीगार्ड्स करीब आते हैं, लिसा का घमंड चूर होने लगता है। वह जो पहले शेरनी बन रही थी, अब बिल्ली बन गई है। सज़ा बराबर के इस क्लाइमेक्स में जो टेंशन है वह लाजवाब है। जमीन पर पड़ी महिला की आंखों में अब डर नहीं, बल्कि न्याय की उम्मीद है। लिसा के हाथ में लकड़ी का टुकड़ा और उसका डरा हुआ चेहरा इस बात का सबूत है कि बुराई का अंत निश्चित है। यह एपिसोड बहुत ही रोमांचक रहा।