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Badla Swayamvar

Sanjana aur Shalu do behan hain. Pehli zindagi mein Sanjana ne Karan Sinha ko chuna aur woh Rajlakshmi ban gayi. Shalu ka jeevan barbaad ho gaya. Shalu ne jalan mein Sanjana ko maar diya. Phir dono Punarjanam le kar Swayamvar ke din wapas aati hain. Is baar Shalu pehle Karan ko chun leti hai aur Sanjana ko bheekh maangne wale ke paas bhej deti hai. Lekin woh bheekh maangne wala chhupa hua samraat hai jo Sanjana se prem karne lagta hai. Kya Sanjana sukh paayegi? Kya Shalu jalan ki sazaa bhogegi?
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इस एपिसोड की समीक्षा

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पूर्ण मनोरंजन

इस मंच पर यह देखना बहुत अच्छा अनुभव रहा। कहानी की रफ्तार बिल्कुल सही है। बदला स्वयंवर को हर किसी को देखना चाहिए। इसमें नाटक, भावना और रोमांच सब है। समय बिल्कुल बर्बाद नहीं होता। ऐसे शो ही असली मनोरंजन करते हैं। पूरी तरह संतुष्टि मिलती है।

संगीत का जादू

ढोल और नगाड़ों की आवाज ने माहौल बना दिया। राजसी स्वागत में वह ध्वनि बहुत जरूरी होती है। बदला स्वयंवर की ध्वनि योजना बहुत सटीक है। कानों में गूंजने वाली आवाजें रोंगटे खड़ी कर देती हैं। बिना संगीत के यह दृश्य अधूरा लगता। संगीत ने जान डाल दी है। शानदार अनुभव।

सच्चाई की जीत

न्यायालय में सच्चाई सामने आई तो सब हैरान थे। अधिकारी भी सिर झुकाने को मजबूर हो गए। बदला स्वयंवर में न्याय की जीत बहुत शानदार तरीके से दिखाई गई। झूठे लोगों को सबक मिलना जरूरी है। यह संदेश समाज के लिए भी अच्छा है। सच्चाई हमेशा ऊपर रहती है। न्याय की जीत हुई।

दृश्य अनुभव

लाल कार्पेट पर चलने का दृश्य सिनेमाई लग रहा था। हजारों लोग और बीच में सिर्फ वह। बदला स्वयंवर का दृश्य अनुभव लाजवाब है। रंगों का इस्तेमाल बहुत गहराई से किया गया है। नीला और सुनहरा रंग शाहीपन दिखाता है। आंखों को बहुत सुकून मिलता है यह देखकर। भव्यता देखते ही बनती है।

साम्राज्ञी का उदय

शुरुआत में घुटनों पर बैठना और अंत में साम्राज्ञी बनना, यह सफर बहुत प्रेरणादायक है। हरे पोशाक वाली महिला की आंखों में जीत की चमक साफ दिखती है। बदला स्वयंवर ने दिखाया कि धैर्य कैसे फल देता है। न्यायालय का माहौल और फिर राजसी ठाठ देखकर रोंगटे खड़े हो गए। यह कहानी दिल को छू लेती है और हर दृश्य में नया जोश है। दर्शक को यह परिवर्तन बहुत पसंद आएगा।

बदले की आग

उस महिला को जब सिपाही घसीट कर ले गए, तो बहुत संतोष मिला। दुश्मन का अंत ऐसे ही होना चाहिए। मुख्य किरदार ने बिना चिल्लाए सब साबित कर दिया। बदला स्वयंवर में बदले की आग बहुत खूबसूरती से दिखाई गई है। संवाद कम थे पर आंखों की बातें सब कह गईं। सजा का मंजर देखकर लगा कि न्याय हुआ है। विलेन का चेहरा देखने लायक था।

शाही रोमांस

सम्राट का इंतजार और फिर हाथ थामना, यह रोमांस बेमिसाल है। पीली पोशाक में वह बहुत जच रहे थे। दोनों के बीच की लगन देखते ही बनती है। बदला स्वयंवर ने प्यार और सत्ता का संगम बहुत अच्छे से दिखाया। अंत में सबके झुकने का दृश्य यादगार है। यह जोड़ी स्क्रीन पर बहुत प्यारी लगती है। उनकी मुस्कान सब कुछ कहती है।

भव्य मंच सज्जा

दाली मंदिर का मंच बहुत भव्य लग रहा था। लकड़ी की नक्काशी और पुराना अंदाज असली लगता है। फिर वही महिला नीले रंग के भारी कपड़ों में चल रही है। बदला स्वयंवर की कला निर्देशन बहुत प्रशंसनीय है। हर कोने में इतिहास झलकता है। दर्शक को उसी युग में ले जाने की ताकत इसमें है। मेहनत साफ दिखती है।

अभिनय की बारीकियां

अभिनेत्री के चेहरे के भाव बदलते देखना रोमांचक था। पहले डर, फिर गुस्सा और अंत में गर्व। हर पल वह किरदार में जी रही थीं। बदला स्वयंवर में अभिनय की बारीकियां गजब की हैं। विलेन की हार पर उसका चेहरा देखने लायक था। ऐसे किरदार ही कहानी को आगे बढ़ाते हैं। तारीफ के काबिल है।

कहानी का मोड़

कहानी में ऐसा मोड़ आया कि उम्मीद नहीं थी। साधारण कपड़ों वाली ही असली ताकतवर निकली। बदला स्वयंवर की पटकथा बहुत चतुराई से लिखी गई है। हर भाग में नया खुलासा होता है। दर्शक बंधा रहता है कि आगे क्या होगा। यह अनिश्चितता ही इसकी खूबी है। रोमांच बना रहता है।

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