भूरे चमड़े के जैकेट वाला शख्स सफेद गाड़ी से उतरते ही माहौल बदल देता है। उसकी चाल में एक अलग ही रौब है जो देखते ही समझ आ जाता है कि वह किसी साधारण मकसद से नहीं आया। भीड़ में खड़ी लाल साड़ी वाली महिला के चेहरे पर घबराहट साफ झलक रही है। यह दृश्य भिखारिन बनेगी मालकिन के क्लाइमेक्स जैसा लगता है जहां टकराव अनिवार्य हो गया है।
लाल रंग की पारंपरिक पोशाक पहनी महिला शुरू में बहुत आत्मविश्वास से बात कर रही थीं, लेकिन जैसे ही वह शख्स आगे बढ़ा, उनके हाथ कांपने लगे। उनकी आंखों में छिपा डर बता रहा है कि वह पिछले किसी वादे या खतरे को याद कर रही हैं। यह मनोवैज्ञानिक खेल दर्शकों को बांधे रखता है और कहानी की गहराई को बढ़ाता है।
काले फूलों वाली साड़ी पहनी युवती का व्यवहार बहुत रहस्यमयी है। वह उस शख्स के पास जाकर मुस्कुराती है और फिर अचानक जमीन पर गिर जाती है। क्या यह कोई नाटक था या सच में धक्का लगा? उसकी आंखों में चालाकी साफ दिख रही थी। यह मोड़ कहानी में नया मोड़ लाता है और दर्शकों को हैरान कर देता है।
गाड़ी के डिक्की से बेसबॉल बैट निकालते ही माहौल में तनाव चरम पर पहुंच गया। वह शख्स और उसके साथी अब सिर्फ बातें नहीं करने वाले हैं। यह हिंसक मोड़ दिखाता है कि मामला अब कानून और व्यवस्था से परे जा रहा है। दर्शक अब सांस रोके देख रहे हैं कि आगे क्या होने वाला है।
आसपास खड़े लोग कुछ बोल नहीं रहे हैं, बस हैरानी से यह तमाशा देख रहे हैं। उनकी चुप्पी उस शख्स के डर को और बढ़ा रही है। यह सामूहिक मनोविज्ञान बहुत अच्छे से दिखाया गया है। लगता है जैसे पूरा गांव उस एक व्यक्ति के खिलाफ खड़ा हो गया हो। भिखारिन बनेगी मालकिन में ऐसे सामाजिक दबाव को बहुत बारीकी से दिखाया गया है।