जब सफेद पोशाक वाला योद्धा मैदान में उतरा, तो हवा में तनाव छा गया। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे वह किसी पुराने वादे को निभा रहा हो। निकम्मा का उदय सिंहासन पलट में ऐसे दृश्य देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उसका हर कदम, हर सांस लड़ाई के लिए तैयार थी। दर्शक भी सांस रोके देख रहे थे कि आखिर यह युवा योद्धा क्या करता है।
नीली साड़ी वाली योद्धा जब तलवार लेकर मैदान में कूदी, तो लगा जैसे आग भड़क उठी हो। उसकी आँखों में गुस्सा और दिल में बदले की आग थी। निकम्मा का उदय सिंहासन पलट के इस दृश्य में उसका हर वार दिल को छू गया। वह सिर्फ लड़ नहीं रही थी, बल्कि अपनी पहचान साबित कर रही थी। उसकी तलवार की चमक और उसके कदमों की आवाज़ ने पूरे मैदान को हिला दिया।
जब सभी लड़ रहे थे, तो वह बुजुर्ग शांत बैठे थे। उनकी आँखों में एक गहराई थी, जैसे वे सब कुछ जानते हों। निकम्मा का उदय सिंहासन पलट में ऐसे पात्र ही कहानी की जान होते हैं। उनकी चुप्पी सबसे ज्यादा डरावनी लग रही थी। लगता था जैसे वे किसी बड़े फैसले के कगार पर हैं। उनकी मौजूदगी से पूरे दृश्य में एक अलग ही वजन आ गया था।
जब सफेद पोशाक वाला योद्धा और नीली साड़ी वाली योद्धा आमने-सामने आए, तो लगा जैसे दो तूफान टकरा रहे हों। निकम्मा का उदय सिंहासन पलट के इस दृश्य में हर पल दिल धड़कने लगा था। उनकी तलवारें जब टकराईं, तो आग की चिंगारियां उड़ रही थीं। यह सिर्फ लड़ाई नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं का टकराव था। दर्शक भी इस टकराव को देखकर हैरान रह गए।
काले कपड़े वाले नेता जब सिंहासन पर बैठे थे, तो उनके चेहरे पर अहंकार साफ झलक रहा था। निकम्मा का उदय सिंहासन पलट में ऐसे खलनायक ही कहानी को रोचक बनाते हैं। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे वे सब कुछ नियंत्रित कर रहे हों। लेकिन जब युद्ध शुरू हुआ, तो उनकी यह चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी। उनका अहंकार ही उनकी कमजोरी बन गया।