बूढ़े किरदार की आँखों में दर्द साफ़ दिख रहा है। जब वह चिल्लाता है तो लगता है जैसे दिल टूट गया हो। गाँव का गौरव ने ऐसे परिवारिक क्लेश को बहुत खूबसूरती से दिखाया है। पुराने ज़माने की वर्दी और आंगन का माहौल कहानी को गहराई देता है। हर डायलॉग में वजन है और अभिनय लाजवाब है। देखकर मन भारी हो गया।
नौजवान लड़के की आँखों में गुस्सा और ठान ली हुई जिद साफ़ झलकती है। गले में तौलिया और पसीने से तर बदन मेहनत की कहानी कहता है। गाँव का गौरव की यह कड़ी दिल को छू लेने वाली है। जब वह तौलिया निचोड़ता है तो लगता है वह अपने गुस्से को भी निचोड़ रहा हो। संघर्ष और जुनून का बेहतरीन संगम है यह दृश्य।
अंतिम संस्कार का दृश्य बहुत भावुक कर देने वाला है। तस्वीर के सामने जलती मोमबत्तियाँ और खामोशी चीख रही है। गाँव का गौरव में दिखाया गया यह दुख हर किसी के दिल को छू लेगा। बूढ़े किरदार का रोना और फिर गुस्से में बदल जाना बहुत ही असली लगता है। परिवार की मजबूरियों को बहुत बारीकी से दिखाया गया है इसमें।
सिक्कों का गिरना और गुल्लक का टूटना किसी बड़ी मुसीबत की ओर इशारा करता है। गाँव का गौरव की कहानी में पैसों का खेल बहुत अहम लग रहा है। गिनतारा चलाने वाले दृश्य से लगता है हिसाब चुकता करने का वक्त आ गया है। हर छोटी चीज़ का इस्तेमाल कहानी को आगे बढ़ाने के लिए किया गया है। यह नाटक बहुत गहराई से बनाया गया है।
दोनों किरदारों के बीच की तनातनी देखते ही बनती है। बूढ़ा किरदार उंगली उठाकर कुछ कड़वा सच कह रहा है तो नौजवान चुपचाप सुन रहा है। गाँव का गौरव ने पीढ़ियों के बीच की खाई को बहुत अच्छे से दिखाया है। आंगन की मिट्टी और दीवारें भी इस कहानी का हिस्सा लगती हैं। ऐसा लगता है जैसे हर कोने में कोई राज़ छिपा हो।