अस्पताल के कमरे में जो तनाव था वो साफ़ दिख रहा था। चमड़े का कोट पहनी महिला की बातें कुछ चुभने वाली थीं। बिस्तर पर लेटी लड़की की आँखों में डर नहीं, बस एक अजीब सी खामोशी थी। जब बाहर सफेद पोशाक वाले ने हाथ पकड़ा, तो स्लेटी कमीज़ वाले की प्रतिक्रिया ने सब बदल दिया। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत देखकर लगा कि ये कहानी अभी शुरू हुई है। हर किरदार के बीच की दूरी बता रही है कि राज़ कुछ और ही है।
चीते जैसे निशान वाला गलाबंध और काला कोट, इस महिला का प्रवेश ही कुछ अलग था। वो मरीज से बात कर रही थी पर नज़रें सब पर थीं। लगता है ये कोई साधारण मुलाकात नहीं थी। बाहर निकलते ही सफेद पोशाक वाले के आने से माहौल गरम हो गया। स्लेटी कमीज़ वाले ने जैसे ही उसका हाथ रोका, समझ आ गया कि आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत में कितनी परतें हैं। हर संवाद के पीछे एक छिपी कहानी है जो दर्शक को बांधे रखती है।
अस्पताल से बाहर निकलते ही जैसे कहानी ने नया मोड़ लिया। सफेद पोशाक वाले शख्स की हिम्मत देखकर हैरानी हुई, उसने बिना सोचे समझे हाथ पकड़ लिया। पर स्लेटी कमीज़ वाले ने जो कदम उठाया, वो काबिले तारीफ था। उसने अपनी दोस्त को बचाने के लिए सीधा टकराव किया। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत के इस दृश्य में जो कार्रवाई थी, वो दिल को छू गई। ऐसे पल ही किसी नाटक को यादगार बनाते हैं और हमें अगली कड़ी का इंतज़ार करवाते हैं।
सफेद कपड़ों में वो लड़की बिस्तर पर लेटी थी, पर उसकी खामोशी शोर मचा रही थी। जब वो महिला उससे मिलने आई, तो उसके चेहरे के भाव नहीं बदले। लगता है वो सब जानती है पर चुप है। बाहर वाले दृश्य में जब उसे खींचा गया, तो उसकी आँखों में घबराहट साफ़ थी। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत में इस किरदार की चुप्पी सबसे बड़ा सवाल है। क्या वो मजबूर है या कोई योजना बना रही है? ये जानने के लिए देखते रहना होगा।
कमरे में नर्स भी थी, पर वो बस तमाशबीन बनकर रह गई। जब वो महिला बात कर रही थी, तो नर्स की आँखों में भी सवाल थे। शायद वो भी कुछ ज्यादा ही जानती थी। दो खड़े हुए पुरुषों का रवैया भी अलग था, एक शांत और एक चिंतित। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत के इस हिस्से में हर छोटा किरदार अपनी कहानी कह रहा है। माहौल इतना भारी था कि साँस लेना भी मुश्किल लग रहा था। ऐसे नाटक ही असली मनोरंजन हैं।
बाहर आते ही सफेद पोशाक वाले ने जो हरकत की, वो बिल्कुल खलनायक वाली थी। उसने जबरदस्ती हाथ पकड़ने की कोशिश की, जैसे उसे सब पर हक़ हो। पर उसे क्या पता था कि सामने कौन खड़ा है। स्लेटी कमीज़ वाले ने उसे सबक सिखा दिया। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत में ये किरदार नफरत के लायक है, पर कहानी को आगे बढ़ाता है। उसका गुस्सा और अकड़ देखकर लगता है कि वो आगे भी मुसीबतें खड़ी करेगा।
शहर का नज़ारा और फिर अस्पताल का बाहरी हिस्सा, सब कुछ बहुत असली लगा। शहर के पहले अस्पताल के बाहर जो हुआ, वो कहानी का अहम हिस्सा था। पेड़ों के बीच वो मुलाकात और फिर झगड़ा, सब कुछ पर्दे पर बहुत अच्छे से कैद हुआ था। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत की जगह चुनने वाले ने कमाल कर दिया। माहौल ऐसा था कि लग रहा था ये सब हमारे आसपास ही हो रहा है। ऐसे दृश्य दर्शक को कहानी से जोड़ते हैं।
इन चार लोगों के बीच का रिश्ता समझना मुश्किल था। कौन किसका साथ दे रहा है और कौन दुश्मन है, ये साफ़ नहीं था। चीते जैसे निशान वाले गलाबंध वाली महिला शायद दोस्त है या दुश्मन, ये उलझन बना रही। स्लेटी कमीज़ वाला लड़का स्पष्ट रूप से सफेद कपड़ों वाली लड़की का साथ दे रहा था। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत में ये रिश्तों की कशमकश ही मुख्य आकर्षण है। हर पल नया शक पैदा होता है और हम बस देखते रह जाते हैं।
भले ही आवाज़ साफ़ नहीं थी, पर चेहरे के हावभाव सब बता रहे थे। चीते जैसे निशान वाले गलाबंध वाली महिला के संवाद में एक अलग ही तेज था। वो बिना चिल्लाए भी अपनी बात मनवा रही थी। सफेद पोशाक वाले की आवाज़ में गुस्सा साफ़ झलक रहा था। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत के कलाकारों ने बिना ज्यादा बोले अपनी बात कह दी। ऐसे अभिनय को देखकर लगता है कि ये कलाकार अपने काम में माहिर हैं। हर भाव मायने रखता है।
पूरी कहानी देखने के बाद बस एक ही शब्द आता है, शानदार। अस्पताल के अंदर का तनाव और बाहर का हंगामा, सब कुछ बराबर था। कहानी में वो कशिश है जो आपको अगला भाग देखने पर मजबूर कर देती है। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत ने मेरी उम्मीदों पर खरा उतरा है। इस मंच पर ऐसे सामग्री मिलना सुकून देता है। मैं बस यही चाहूंगा कि अगली कड़ी जल्दी आए क्योंकि अब और इंतज़ार नहीं हो रहा है।