किराना स्टोर में वह पल बहुत खास था जब भूरे कोट वाले ने फोन का डिब्बा दिया। ऊनी कोट वाले की खुशी देखने लायक थी, लेकिन फिर भी आंखों में कुछ छिपा था। जैसे आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत वाली कहानी में होता है, हर चीज सीधी नहीं होती। थर्मस का आदान प्रदान देखकर लगा कि रिश्ते गहरे हैं। बाहर का दृश्य दिल को छू गया।
दुकान बंद करते वक्त उसकी आंखों में जो दर्द था, वह शब्दों से बयां नहीं होता। जब उसने जोड़े को बाहर चलते देखा, तो सब समझ आ गया। यह वही पल है जब आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत वाली लाइन सार्थक हो जाती है। बिना संवाद के इतनी कहानी कहना आसान नहीं है। अभिनय बहुत स्वाभाविक लगा।
यह किराना की दुकान सिर्फ सामान नहीं बेचती, यहाँ तो जज्बात भी बिकते हैं। भूरे कोट वाले के आगमन से कहानी में मोड़ आया। ऊनी कोट वाले ने थर्मस पकड़ाया तो लगा गर्माहट मिल गई। पर अंत में वह अकेलापन साफ दिखा। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत जैसे मूड में डूब गया मैं। दृश्य बहुत भावुक था।
कभी कभी छोटी चीजें बड़ा असर छोड़ती हैं। फोन का गिफ्ट हो या थर्मस की वापसी, हर चीज में एक मजबूरी थी। युवती की मासूमियत और उसकी मजबूरी दोनों साफ झलकीं। कहानी में आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत वाला अनुभव आता है जब वह दरवाजा बंद करता है। पृष्ठभूमि संगीत भी उत्कृष्ट था।
तीन लोगों के बीच का यह त्रिकोण बहुत बारीकी से दिखाया गया है। भूरा कोट वाला शायद मदद कर रहा था, पर ऊनी कोट वाले का दर्द असली था। जब वह बाहर खड़ा होकर उन्हें देख रहा था, तो दिल भारी आ गया। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत वाली स्थिति साफ दिख रही थी। छायांकन ने मूड बनाए रखा।
बाहर का मौसम और अंदर का हाल दोनों एक जैसे थे। जब उसने शटर नीचे किया, तो लगा जैसे उसने अपने दिल को भी बंद कर लिया। युवती की मुस्कान में भी एक उदासी थी। यह दृश्य आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत वाले मूड को बहुत अच्छे से पकड़ता है। हर पल में कहानी छिपी है।
महंगा फोन मिलने पर भी चेहरे पर वो चमक नहीं थी जो थर्मस लेते वक्त थी। इससे साफ है कि कीमत नहीं, अहमियत मायने रखती है। भूरे कोट वाले के जाने के बाद जो खामोशी छाई, वह शोर मचाती थी। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत वाली कहानी में यही तो होता है। कलाकारों ने जान डाल दी।
दुकान से निकलने के बाद का दृश्य सबसे ज्यादा भावुक था। वह अकेला खड़ा था और वो दोनों साथ जा रहे थे। दूरी सिर्फ कदमों की नहीं, दिलों की भी थी। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत वाली लाइन इसी पल के लिए बनी है। निर्देशन बहुत सटीक है। देखकर रोना आ गया।
कपड़ों के रंग भी कहानी कह रहे थे। हल्का भूरा ऊनी कोट में वह सरल लग रहा था, जबकि गहरा भूरा कोट में वह प्रभावशाली था। युवती की सादगी सबका ध्यान खींचती है। जब कहानी आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत की ओर बढ़ती है, तो रंग भी फीके पड़ जाते हैं। दृश्य कथा शानदार है।
कहानी वहीं खत्म होती है जहां से शुरू होती है, पर कुछ बदल चुका होता है। उसकी आंखों में सवाल थे पर जवाब नहीं थे। थर्मस अभी भी उसके पास था, पर गर्माहट कहीं खो गई थी। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत वाली अनुभूति पूरे क्लिप में बनी रहती है। बहुत गहरा असर छोड़ा।