जेल की सलाखों के पीछे बुजुर्ग कैदी की मायूसी देखकर दिल दहल गया। वो वाकई अपराधी है या किसी साजिश का शिकार? आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत में ऐसे मोड़ बार बार आते हैं। काले कोट वाले शख्स के चेहरे पर गंभीरता साफ झलक रही थी। क्या वो सच जान पाएगा? यह सवाल दिमाग में घूम रहा है। हर सीन में नया रहस्य खुलता है।
किराना स्टोर का माहौल अचानक तनावपूर्ण हो गया जब वो शख्स फोन देखकर चौंका। मैसेज में हिंदी में लिखा था कि सब कबूल हो गया है। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत की कहानी में हर पल नया सुराग मिलता है। चश्मे वाले दोस्त की चुप्पी भी शक पैदा कर रही थी। सब कुछ सामने आना बाकी है। कौन है असली खिलाड़ी?
सफेद ब्लेजर वाली युवती ने जब मेडिकल बॉक्स खोला तो लगा कोई बड़ा प्लान चल रहा है। घाव साफ करते वक्त दोनों की आंखों में कुछ अनकहा था। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत में रोमांस और खतरा साथ चलते हैं। बाहर काली गाड़ी का रुकना और भी सस्पेंस बढ़ाता है। कौन आया है? क्या वो दुश्मन है?
गार्ड्स की वर्दी और जेल का सेट बहुत रियलिस्टिक लग रहा था। बुजुर्ग अभिनेता की एक्टिंग ने सीन को वजन दिया। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत जैसे ड्रामा में यही डिटेलिंग काम आती है। काले कोट वाले लीडर की एंट्री ने पूरी कहानी बदल दी। अब खेल बदल गया है। सच्चाई सामने आएगी।
फोन स्क्रीन पर हिंदी टेक्स्ट देखकर हैरानी हुई, यह कहानी कहां से कहां पहुंच गई। वीर भाई और सूर्य मल्होत्रा का जिक्र नई पहेली खड़ी करता है। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत में कन्फ्यूजन ही असली हथियार है। किराना स्टोर अब सुरक्षित नहीं लग रहा। खतरा पास है। कोई देख रहा है।
युवती के हाथों में कांप और शख्स के चेहरे पर स्थिरता का कंट्रास्ट देखने लायक था। चोट छोटी थी पर असर गहरा था। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत में छोटी चीजें बड़ा मतलब रखती हैं। बाहर खड़ी कार किसी दुश्मन को ला सकती है। माहौल बहुत भारी हो गया है। सांसें थम गई हैं।
चश्मे वाले शख्स की नजरें बार बार बाहर जा रही थीं, क्या वो किसी को इंतजार कर रहा था? आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत की स्क्रिप्ट में धोखा हर कोने में छिपा है। काले कोट वाले को भरोसा किस पर करना चाहिए, यह सबसे बड़ा सवाल है। दोस्त या दुश्मन कोई नहीं जानता। वक्त कम है।
जेल से लेकर स्टोर तक की कटिंग बहुत तेज थी, बोरियत का नाम नहीं था। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत में एक्शन और इमोशन का बैलेंस सही है। मेडिकल बॉक्स खोलने का सीन बहुत सस्पेंसफुल था, अंदर क्या था कोई नहीं जानता। हर चीज एक सुराग बन सकती है। कहानी आगे बढ़ती है।
काली गाड़ी के कांच में रिफ्लेक्शन देखकर लगा कोई छाया पीछा कर रहा है। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत में खतरा कभी भी दस्तक दे सकता है। लीड किरदार के हाथ का घाव सिर्फ शारीरिक नहीं, मानसिक भी लग रहा था। दर्द साफ झलक रहा था चेहरे पर। सब कुछ बदल सकता है।
आखिरी सीन में सबकी सांसें रुक गईं जब गाड़ी का दरवाजा खुला। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत का क्लिफहैंगर हमेशा दिल धड़का देता है। अगली कड़ी में क्या होगा, यह जानने के लिए बेचैनी बढ़ रही है। कहानी बहुत रोचक मोड़ ले रही है। इंतजार मुश्किल है।