दुकान में जब गुंडे घुसते हैं तो माहौल तनावपूर्ण हो जाता है। चश्मे वाला व्यक्ति मदद के लिए तरस रहा है लेकिन असमर्थ है। ठीक उसी वक्त नायक का प्रवेश होता है जो सब कुछ बदल देता है। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत में ऐसा नाटक देखने को मिलता है जो रोंगटे खड़े कर दे। अभिनय बहुत ही दमदार है और हर पल आपको बांधे रखता है। संघर्ष की शुरुआत बहुत ही धमाकेदार होती है। दर्शक इस कहानी में खो जाते हैं। हर दृश्य में जान है। यह एक बेमिसाल कहानी है।
भूरे कोट वाले लड़के का प्रवेश किसी तूफान से कम नहीं था। उसने बिना ज्यादा बोले अपने मुक्कों से जवाब दिया। गुंडों को एक एक करके पटकना बहुत सुकून देने वाला था। नेता को गले से पकड़ना उसका गुस्सा दिखाता है। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत में संघर्ष के दृश्य बहुत ही शानदार तरीके से फिल्माए गए हैं। साहसिक दृश्य प्रेमियों के लिए यह एक उपहार है। यह एक बेमिसाल कहानी है। रोमांच की कमी नहीं है।
नाग वाली शर्ट वाला खलनायक पूरी तरह नफरत के लायक है। उसका घमंड आपको उसे गिरता हुआ देखने के लिए मजबूर कर देता है। जब उसने पेय पदार्थ गिराए तो अराजकता बढ़ गई। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत में खलनायक की रूपरेखा बहुत प्रभावशाली है। उसकी हरकतें दर्शकों के गुस्से को भड़काती हैं। उसका अंत देखकर सुकून मिलता है। नफरत की हद होती है। सबक मिलना जरूरी है।
चमड़े के कोट वाली महिला बहुत डरी हुई लेकिन बहादुर लग रही है। वह मेज के पीछे खड़ी है लेकिन उसकी आंखों में चिंता साफ दिखती है। उसकी और दुकान मालिक के बीच का संबंध गहराई जोड़ता है। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत में पात्रों के बीच के रिश्ते बहुत बारीकी से दिखाए गए हैं। भावनाएं बहुत गहरी हैं। यह दिल को छू लेता है। रिश्ते निभाना जरूरी है। असलियत झलकती है।
लड़ाई के दृश्य बहुत ही स्पष्ट और तेज हैं। कोई अनावश्यक धीमा चलना नहीं है। संकरे रास्ते में संघर्ष बहुत ही वास्तविक लगता है। बोतलों के टूटने की आवाज़ प्रभाव को बढ़ाती है। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत में साहसिक कार्यों की योजना बहुत ही बेहतरीन है जो आपको आसन से नहीं हिलने देती। यह एक शानदार अनुभव है। रोमांच की कमी नहीं है। अंत तक देखें।
चश्मे वाले व्यक्ति की बातचीत की कोशिश बुरी तरह विफल हो जाती है। यह दिखाता है कि कभी कभी गुंडों के सामने शब्द काम नहीं करते। आपको ताकत का इस्तेमाल करना पड़ता है। यह सबक आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत में बहुत स्पष्ट रूप से दिखाया गया है। संवाद और स्थिति बहुत ही वास्तविक लगती है। सच्चाई कड़वी होती है। सबक मिलना जरूरी है। कहानी आगे बढ़ती है।
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कमजोरों की रक्षा करना इस कहानी का मुख्य विषय है। नायक सिर्फ दिखावे के लिए नहीं बल्कि अन्याय रोकने के लिए कूदता है। लड़ने से पहले उसकी आंखों में एक कहानी छिपी होती है। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत में भावनात्मक पक्ष बहुत ही मजबूत है। यह सिर्फ संघर्ष नहीं बल्कि जज्बात भी है। दिल को छू लेता है। इंसानियत बची रहती है। असलियत झलकती है।
सुविधा दुकान की सजावट बहुत ही परिचित और असली लगती है। ऐसा लगता है जैसे यह कोई वास्तविक जगह हो न कि सिर्फ मंच। रोशनी प्राकृतिक है जो संघर्ष को जमीन से जोड़ती है। आज छूटा हूँ, आज ही उलझा मत में स्थान का चयन बहुत ही समझदारी से किया गया है। यह कहानी को विश्वसनीय बनाता है। माहौल बहुत अच्छा है। असलियत झलकती है। अंत तक देखें।
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