शुरुआत में ही जब सैन्य अधिकारी कमरे में दाखिल होते हैं, तो माहौल में एक अजीब सी गंभीरता छा जाती है। उनकी वर्दी और चेहरे के भाव बता रहे हैं कि यह कोई साधारण बैठक नहीं है। हुनर जो सच लगे, वह इस तनावपूर्ण माहौल में साफ झलकता है। हर किसी की आंखों में सवाल हैं, लेकिन कोई बोलने की हिम्मत नहीं कर रहा। यह दृश्य दर्शकों को तुरंत कहानी में खींच लेता है।
जब वह बुजुर्ग अधिकारी गुस्से में कागजात फेंकते हुए चिल्लाते हैं, तो लगता है जैसे कमरे में बिजली गिर गई हो। उनके चेहरे पर क्रोध और निराशा दोनों साफ दिख रहे थे। सामने बैठा युवक डरा हुआ है, लेकिन चुप है। हुनर जो सच लगे, वह इसी तरह के भावनात्मक विस्फोट में छिपा होता है। यह दृश्य दर्शकों के दिल की धड़कन तेज कर देता है।
जब सभी चिल्ला रहे थे, तब दो वैज्ञानिक शांति से कॉफी पी रहे थे। उनकी आंखों में एक अलग ही चमक थी, जैसे वे सब कुछ समझ रहे हों। हुनर जो सच लगे, वह इस शांति में छिपा था। वे जानते थे कि अंत में सच्चाई वही बोलेगी जो विज्ञान कहता है। यह विरोधाभास दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देता है कि असली ताकत किसमें है।
युवा लड़का जो स्टोरीबोर्ड के सामने खड़ा है, उसके चेहरे पर चिंता और उत्साह दोनों दिख रहे हैं। वह अपनी कहानी को सही तरीके से पेश करना चाहता है, लेकिन बड़ों के दबाव में फंसा हुआ है। हुनर जो सच लगे, वह उसकी आंखों में दिखता है जब वह अपनी रचनात्मकता को बचाने की कोशिश करता है। यह हर उस युवा की कहानी है जो सिस्टम से लड़ता है।
जब वह चश्मे पहने आदमी पसीने से तर-बतर होकर बात करता है, तो लगता है जैसे उसने कोई बड़ा राज छिपा रखा हो। उसकी आंखों में डर और बेचैनी साफ दिख रही थी। हुनर जो सच लगे, वह उसकी इस घबराहट में छिपा था। शायद वह जानता था कि सच्चाई सामने आने वाली है। यह दृश्य दर्शकों को अनुमान लगाने पर मजबूर कर देता है।