शुरुआत में सिर्फ एक गड्ढा था, लेकिन तीन महीने बाद वहां एक चमत्कार खड़ा हो गया। जब डायरेक्टर कपूर ने उस टावर को देखा, तो उनकी आंखों में जो चमक थी, वो किसी सफलता से कम नहीं थी। हुनर जो सच लगे, वो इसी तरह के जुनून में दिखाई देता है। रेत के तूफान और मशीनों की आवाज के बीच यह दृश्य किसी साइंस फिक्शन फिल्म से कम नहीं लग रहा था।
जब वो काली गाड़ी से उतरे और धूल के बीच चलते हुए टावर की तरफ देखे, तो लगा जैसे कोई सुपरहीरो एंट्री ले रहा हो। उनके चश्मे और सूट ने उन्हें एक अलग ही पावर दी थी। रोहन खन्ना का हैरान चेहरा देखकर समझ आ गया कि यह प्रोजेक्ट कितना बड़ा है। नेटशॉर्ट ऐप पर ऐसे सीन्स देखना सुकून देता है, बिल्कुल सिनेमा हॉल जैसा फील।
टावर पर लगी नीली लाइट्स और पाइप्स का डिजाइन देखकर लगता है कि हम साल 2050 में आ गए हैं। जब वो लड़का टावर के मैकेनिज्म को समझा रहा था, तो टेक्नोलॉजी का जादू साफ दिख रहा था। डायरेक्टर कपूर का थम्स अप करना उस पल की सबसे बड़ी तारीफ थी। हुनर जो सच लगे, वो इंजीनियरिंग और आर्ट के इस मिलन में है।
जैसे ही प्रेस और कैमरा वाले पहुंचे, पूरा रेगिस्तान एक फिल्म सेट लगने लगा। लोग फोन निकालकर फोटो ले रहे थे और सबकी नजरें उस ऊंचे टावर पर टिकी थीं। यह दिखाता है कि जब कुछ बड़ा होता है, तो दुनिया रुककर देखती है। रोहन खन्ना का शॉक्ड एक्सप्रेशन उस पल की गवाही दे रहा था कि यह कोई आम दिन नहीं है।
लाल टोपी वाले शख्स और उस लड़के के बीच का कनेक्शन बहुत गहरा लग रहा था। जब वो शख्स लड़के के कंधे पर हाथ रखकर बात कर रहा था, तो लगा जैसे कोई मेंटर अपने स्टूडेंट को गाइड कर रहा हो। उनकी बॉडी लैंग्वेज में जो अपनापन था, वो हुनर जो सच लगे, उससे कहीं ज्यादा इमोशनल था। यह सीन दिल को छू गया।