शुरुआत में न्यूज़ एंकर की जो शांत मुस्कान है, वो किसी बड़ी आंधी से पहले की खामोशी लगती है। जैसे ही स्क्रीन पर 'हुनर जो सच लगे' का जिक्र आता है, माहौल बदल जाता है। कंट्रोल रूम की भागदौड़ और उस युवक की घबराहट साफ दिखाती है कि सब कुछ प्लान के मुताबिक नहीं चल रहा। यह तनाव दर्शक को सीट से बांधे रखता है।
जब वह युवक वॉकी-टॉकी पर बात करता है, तो उसकी आवाज़ में जो कंपन है, वो पूरे मिशन की नाजुक स्थिति बता देता है। पीछे चल रहे बड़े स्क्रीन और तकनीकी उपकरण यह एहसास दिलाते हैं कि 'हुनर जो सच लगे' सिर्फ एक शो नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी है। हर सेकंड की कीमत यहाँ बहुत ज्यादा है।
ऑफिस के उस सीन में जब बूढ़े वैज्ञानिक और सूट वाले आदमी चल रहे हैं, तो उनकी चुप्पी सबसे ज्यादा शोर मचा रही है। कागजात देखते हुए उनकी गंभीर मुद्रा बताती है कि 'हुनर जो सच लगे' के पीछे की सच्चाई बहुत गहरी है। कॉरिडोर की रोशनी और उनकी परछाइयों का खेल बहुत खूबसूरत था।
जब स्क्रीन पर स्पेस स्टेशन और पृथ्वी का नज़ारा आया, तो सांस रुक गई। 'हुनर जो सच लगे' ने विजुअल्स के मामले में कोई कसर नहीं छोड़ी। वह रिंग वाला स्टेशन और उसका घूमना, सब कुछ इतना रियल लग रहा था कि लगा मैं भी वहीं हूं। साइंस फिक्शन पसंद करने वालों के लिए यह एक विजुअल ट्रीट है।
बाहर खड़ी भीड़ और पुलिस की बैरिकेडिंग उस डर को बयां करती है जो आम लोगों के दिल में है। जब लाउडस्पीकर से आवाज़ आती है, तो लगता है कि कुछ बड़ा होने वाला है। 'हुनर जो सच लगे' ने इस पब्लिक पैनिक को बहुत ही बारीकी से दिखाया है। हर चेहरे पर अलग-अलग भावनाएं साफ पढ़ी जा सकती हैं।