जब वह महिला सफेद सूट में मंच पर खड़ी थी, तो पूरा हॉल सन्नाटे में था। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा दर्द था जो सीधे दिल में उतर गया। जैसे ही वह नीचे उतरी, उसकी नज़रें उस लड़के से मिलीं जो दरवाज़े पर खड़ा था। पहला प्यार, आखिरी अलविदा की कहानी यहीं से शुरू होती है जहाँ एक माँ और बेटे के बीच की दूरी साफ़ दिख रही थी। उस पल की खामोशी चीख रही थी।
नीली सूट वाले शख्स का चेहरा देखकर लग रहा था जैसे वह किसी टूटे हुए सपने को जोड़ने की कोशिश कर रहा हो। जब उसने उस बच्चे का हाथ थामा, तो उसकी पकड़ में एक डर था, एक असुरक्षा थी। वह जानता था कि अब सब कुछ बदलने वाला है। पहला प्यार, आखिरी अलविदा में ऐसे सीन्स दिल को चीर देते हैं जब रिश्तों की डोर टूटने लगती है और कोई कुछ नहीं कर पाता।
जब वह जोड़ा दरवाज़े से बाहर निकला और सामने खड़े शख्स से टकराया, तो हवा में बिजली कड़क गई। उस शख्स की आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरा धोखा था। उसने उस महिला की कलाई पकड़ी, लेकिन उसकी पकड़ में हिंसा नहीं, बस एक आखिरी उम्मीद थी। पहला प्यार, आखिरी अलविदा का यह मोड़ सबसे ज्यादा इमोशनल था क्योंकि यहाँ प्यार और नफरत की लकीरें मिट रही थीं।
उस छोटे बच्चे की आँखों में जो डर था, वह किसी वयस्क के चेहरे पर भी नहीं देखा। वह बस अपनी माँ को देख रहा था जो किसी और के साथ जा रही थी। उसकी चुप्पी सबसे ज्यादा शोर मचा रही थी। पहला प्यार, आखिरी अलविदा में बच्चों के रिएक्शन हमेशा सबसे ज्यादा दर्दनाक होते हैं क्योंकि वे सब समझते हैं लेकिन बोल नहीं पाते। उस पल को देखकर रूह कांप गई।
डायरेक्टर ने कलर्स का इस्तेमाल बहुत होशियारी से किया है। सफेद सूट वाली महिला की मासूमियत और नीले सूट वाले शख्स का ठंडापन। जब ये दोनों एक फ्रेम में आए, तो लगा जैसे दो दुनियाएं टकरा रही हों। पहला प्यार, आखिरी अलविदा की विजुअल स्टोरीटेलिंग कमाल की है। हर कपड़ा, हर रंग एक कहानी कह रहा था जो डायलॉग से ज्यादा असरदार था।