जब परिवार सामान बांधकर जाने की तैयारी कर रहा था, तभी दरवाजे पर दस्तक ने सब कुछ बदल दिया। वह लड़का और उसका साथी जिस तरह से अंदर आए, उनकी आंखों में एक अजीब सी उम्मीद थी। महिला के चेहरे पर हैरानी और पुरानी यादों का दर्द साफ दिख रहा था। पहला प्यार, आखिरी अलविदा की कहानी में यह मोड़ बहुत भावुक कर देने वाला है। अंगूठी वापस लौटाने का वह पल दिल को छू गया।
सड़क पर बैठी उस महिला की हालत देखकर दिल दहल गया। गंदे कपड़े और चेहरे पर मिट्टी, मानो जिंदगी ने उसे बहुत मारा हो। जब वह आदमी और बच्चा उसके पास से गुजरे, तो लगा शायद मदद मिलेगी, लेकिन वे आगे बढ़ गए। यह दृश्य समाज की बेरुखी को बहुत करीब से दिखाता है। पहला प्यार, आखिरी अलविदा में ऐसे दृश्य सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि इंसानियत कहीं खो तो नहीं गई।
उस छोटे बच्चे ने जो कार्ड और तोहफा दिया, उसमें एक अलग ही मासूमियत थी। 'जन्मदिन की बधाई' लिखा वह कार्ड और बच्चे की प्यारी सी ड्राइंग देखकर महिला की आंखें नम हो गईं। शायद उसे अपनी बीती हुई यादें ताजा हो गई हों। इस शॉर्ट फिल्म में छोटे-छोटे पलों को बहुत खूबसूरती से दिखाया गया है। पहला प्यार, आखिरी अलविदा की यह कहानी बताती है कि रिश्ते कभी पूरी तरह खत्म नहीं होते।
पूरे वीडियो में डायलॉग बहुत कम हैं, लेकिन हर किरदार की आंखें हजारों बातें कह रही हैं। जब वह आदमी अंगूठी वापस करता है, तो महिला का चेहरा पढ़ने लायक होता है। न गुस्सा, न नफरत, बस एक गहरा सन्नाटा। पहला प्यार, आखिरी अलविदा में ऐसे ही खामोश पलों ने कहानी को गहराई दी है। अंत में सड़क पर बैठी महिला का दृश्य इस बात का संकेत है कि कुछ जख्म कभी नहीं भरते।
एक तरफ सूट-बूट में सजे लोग और दूसरी तरफ सड़क पर बैठी बेसहारा महिला। यह विरोधाभास बहुत चुभने वाला है। शायद कभी वह महिला भी उसी घर की हिस्सा रही हो, या शायद वह उस आदमी की पुरानी पहचान हो। पहला प्यार, आखिरी अलविदा की पटकथा में यह अनकहा रहस्य दर्शकों को बांधे रखता है। जब वे उसे अनदेखा करके आगे बढ़ जाते हैं, तो लगता है कि वक्त किसी के लिए नहीं रुकता।