उस छोटी सी बच्ची की आँखों में जो दर्द था, वो किसी डायलॉग से ज़्यादा बोल रहा था। जब वो चुपचाप खड़ी थी और बड़े लोग शोर मचा रहे थे, तो लग रहा था जैसे दुनिया का सारा बोझ उसके कंधों पर हो। तीन मामाओं का पछतावा देखकर दिल दहल गया, खासकर जब माँ ने उसे समझाने की कोशिश की।
नीली सूट पहने शख्स की हालत देखकर तरस आ रहा था। वो बार-बार समझाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन कोई उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था। उसकी आवाज़ में जो गिड़गिड़ाहट थी, वो साफ़ जाहिर कर रही थी कि वो कितना टूट चुका है। तीन मामाओं का पछतावा सच में दिल को छू लेने वाला है।
हरे रंग की शर्ट वाली महिला के चेहरे पर जो भाव थे, वो हजारों कहानियाँ कह रहे थे। वो नाराज़ भी थी और मजबूर भी। जब उसने चेकबुक निकाली, तो लगा जैसे उसने अपने जज़्बातों को भी नंबरों में तब्दील कर दिया हो। तीन मामाओं का पछतावा में ऐसे सीन्स बहुत गहराई से उतारे गए हैं।
जब वो औरत चेक लिख रही थी, तो ऐसा लग रहा था जैसे वो पैसे से अपने अपराधबोध को खरीद रही हो। बच्ची की मासूमियत के सामने ये कागज़ के टुकड़े कितने बेकार लग रहे थे। तीन मामाओं का पछतावा ने ये सबक बहुत खूबसूरती से सिखाया है कि पैसा सब कुछ नहीं होता।
हरियाली और धूप वाले बगीचे में जो तनाव था, वो कमाल का था। चारों तरफ शांति थी, लेकिन इंसानों के बीच जंग छिड़ी हुई थी। ये विरोधाभास सीन को और भी ड्रामेटिक बना रहा था। तीन मामाओं का पछतावा की शूटिंग लोकेशन ने कहानी की गहराई को और बढ़ा दिया है।