जब उस आदमी ने जमीन से टूटी हुई तस्वीर उठाई, तो कमरे में सन्नाटा छा गया। बच्ची की आँखों में डर और गुस्सा दोनों साफ दिख रहे थे। तीन मामाओं का पछतावा उस पल और गहरा हो गया जब उसने तस्वीर का टुकड़ा बच्ची को दिया। हर चेहरे पर अलग-अलग भावनाएँ थीं—कुछ शर्मिंदा, कुछ गुस्से में, और कुछ बस देख रहे थे। यह दृश्य दिल को छू लेता है।
वह छोटी बच्ची बिना कुछ बोले सब कुछ कह गई। उसकी आँखों में जो दर्द था, वह किसी डायलॉग से ज्यादा असरदार था। जब उसने तस्वीर का टुकड़ा लिया, तो लगा जैसे उसने अपना दिल संभाल लिया हो। तीन मामाओं का पछतावा उसकी चुप्पी में और भी गूंजता है। ऐसे दृश्य दिखाते हैं कि बच्चे कितना कुछ समझते हैं, भले ही वे बोलें नहीं।
पहले वह गुस्से में लग रहा था, फिर अचानक मुस्कुरा दिया। यह बदलाव चौंकाने वाला था। क्या वह सच में बदल गया या बस दिखावा कर रहा है? तीन मामाओं का पछतावा उसकी इस मुस्कान में और भी गहरा लगता है। उसने बच्ची को तस्वीर देकर शायद अपना अपराध बोध कम करने की कोशिश की। लेकिन क्या यह काफी है?
उस महिला ने शुरू में घमंड दिखाया, लेकिन बाद में उसकी आँखों में पछतावा झलका। जब उसने बच्ची को देखा, तो उसका चेहरा नरम पड़ गया। तीन मामाओं का पछतावा उसके हर हाव-भाव में दिखता है। शायद उसे एहसास हो गया कि उसने क्या गलत किया। उसकी खामोशी भी एक तरह का माफीनामा थी।
एक बच्ची चुपचाप खड़ी थी, जबकि दूसरी को जबरदस्ती चुप कराया गया। यह अंतर दिल दहला देने वाला था। तीन मामाओं का पछतावा इन दोनों के डर में साफ दिखता है। एक की आँखों में सवाल थे, तो दूसरी की आँखों में बेबसी। यह दृश्य दिखाता है कि बच्चों पर वयस्कों के झगड़ों का कितना गहरा असर पड़ता है।