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झूठी कसम, सच्ची लगनवां6एपिसोड

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झूठी कसम, सच्ची लगन

रुद्र, जिसे औरतों से एलर्जी है, नशे में आरोही से शादी कर लेता है। दोनों को एक दूसरे का चेहरा याद नहीं रहता। वह विदेश भाग जाता है। आरोही अपनी माँ के बिलों के लिए संघर्ष करती है। एक साल बाद, रुद्र उससे एक क्लीनर के रूप में मिलता है, उसे कॉन्ट्रैक्ट गर्लफ्रेंड बना लेता है। धीरे धीरे दोनों एक दूसरे से प्यार करने लगते हैं और बाद में पता चलता है कि वे पहले से ही शादीशुदा हैं।
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इस एपिसोड की समीक्षा

नर्स की आंखों का डर

नर्स के चेहरे पर डर साफ़ दिख रहा था जब उसने फोन देखा। उसकी आंखों में बेचैनी थी जो किसी बड़े झूठ की ओर इशारा करती है। झूठी कसम, सच्ची लगन की कहानी में हर मोड़ पर नई उत्सुकता है। अस्पताल के सीन बहुत भावुक हैं। क्या वो मरीज ठीक हो पाएगा? नर्स की हिम्मत की दाद देनी होगी कि उसने सच सामने रखने की कोशिश की।

बेटे की टूटी हुई हालत

बेटा शराब की बोतल लेकर सोफे पर बैठा था, उसकी हालत देखकर दिल दुखी हो गया। माँ की डांट उसे अंदर तक हिला गई थी। झूठी कसम, सच्ची लगन में रिश्तों की टूटन बहुत खूबसूरती से दिखाई गई है। पुरानी यादों वाले सीन में उसकी और नर्स का लगाव लाजवाब था। क्या प्यार जीत पाएगा या परिवार की जिद? यह सवाल हर दर्शक के मन में है।

फोन कॉल का बड़ा मोड़

फोन की घंटी बजते ही माहौल बदल गया। लूका नाम देखते ही दादी माँ का चेहरा उतर गया। झूठी कसम, सच्ची लगन में छोटी छोटी चीजें बड़े राज खोलती हैं। नर्स ने जब फोन दिखाया तो सबकी सांसें रुक गईं। यह मोड़ बिल्कुल उम्मीद नहीं था। रहस्य बनाए रखने का यह तरीका बहुत पसंद आया। रात भर जागकर भी यह धारावाहिक देखने का मन करता है।

शाही ठाठ और बाठ

महल जैसा घर और अस्पताल का कमरा, हर जगह अमीरी झलकती है। दादी माँ की टोपी और मोती की माला बहुत शाही लग रही थी। झूठी कसम, सच्ची लगन की दृश्य गुणवत्ता फिल्म जैसी है। रंगों का इस्तेमाल और रोशनी का खेल देखने लायक है। सिर्फ कहानी नहीं, नज़ारा भी दिल को सुकून देता है। ऐसे निर्माण स्तर वाले कार्यक्रम कम ही मिलते हैं।

गुस्से और सत्ता की जंग

नर्स और दादी माँ के बीच की बहस बहुत तेज थी। नर्स ने हाथ उठाकर मना किया तो लगा जैसे उसने हद पार कर दी हो। झूठी कसम, सच्ची लगन में सत्ता संतुलन बहुत दिलचस्प है। कौन किस पर राज चला रहा है, यह समझना मुश्किल हो रहा है। गुस्सा और बेचैनी दोनों ही किरदारों में साफ़ दिख रहे थे। नाटक देखने का असली मज़ा यहीं है।

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