इस दृश्य में जो तनाव है वह सच में रोंगटे खड़े कर देने वाला है। एक तरफ शतरंज की मोहरें और दूसरी तरफ इंसानों की जिंदगियां दांव पर लगी हैं। वह बुजुर्ग व्यक्ति जो चीख रहा है, उसकी आंखों में बेबसी साफ दिख रही है। तूफान: पिता के कंधे जैसे नाटक में ऐसे दृश्य देखकर लगता है कि सत्ता का नशा इंसान को कितना क्रूर बना देता है। कुर्सी पर बैठा शख्स कितना ठंडा और बेरहम है, बिल्कुल पत्थर दिल।
कार्यालय का वह माहौल और वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों का व्यवहार सच में डरावना है। जब एक पिता को अपने बच्चों के सामने इस तरह अपमानित किया जाए, तो दर्द का अंदाजा लगाना मुश्किल है। तूफान: पिता के कंधे की कहानी में यह दृश्य सबसे ज्यादा दिल दहला देने वाला है। वह लड़की जो हथकड़ी में है, उसकी चुप्पी में जो चीख है, वह शोर से ज्यादा असरदार है। अभिनय जबरदस्त है, हर चेहरे पर अलग-अलग भावनाएं साफ दिख रहे हैं।
जिस तरह से वह मुख्य किरदार शतरंज खेलते हुए भी सब कुछ नियंत्रण कर रहा है, वह उसकी शक्ति को दिखाता है। उसे न तो गुस्सा आ रहा है और न ही दया। यह ठंडापन सबसे ज्यादा खतरनाक है। तूफान: पिता के कंधे में ऐसे खलनायक किरदार हमेशा यादगार बन जाते हैं। सामने खड़ा बुजुर्ग व्यक्ति गिड़गिड़ा रहा है, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा। यह दृश्य शक्ति और भावनाओं का एक उत्कृष्ट उदाहरण है जो दर्शकों को बांधे रखता है।
जब पिता को पकड़कर रखा जाता है और बेटी बस देखती रह जाती है, तो उस मजबूरी को शब्दों में बयां करना मुश्किल है। तूफान: पिता के कंधे ने परिवार के रिश्तों और सत्ता के टकराव को बहुत गहराई से दिखाया है। वह बुजुर्ग आदमी बार-बार हाथ जोड़ रहा है, शायद अपनी बेटी की जान की भीख मांग रहा हो। ऐसे दृश्य देखकर आंखें नम हो जाती हैं। कलाकार ने अपनी भूमिका को बहुत ही बखूबी निभाया है, खासकर वह जो कुर्सी पर बैठा है।
यह दृश्य साबित करता है कि जब इंसान के पास शक्ति होती है, तो वह कैसे दूसरों के दर्द को महसूस करना बंद कर देता है। शतरंज की बिसात पर मोहरें चलाने वाला शख्स असल जिंदगी में भी लोगों को मोहरा बना रहा है। तूफान: पिता के कंधे की पटकथा में यह मोड़ बहुत ही शानदार है। सुरक्षाकर्मियों का व्यवहार और वह माहौल सच में दम घुटने वाला है। दर्शक के रूप में आप बस देखते रह जाते हैं कि आगे क्या होगा। रहस्य बना हुआ है।