जब वो रस्सियों में जकड़ा जमीन पर पड़ा था, तब भी उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी चमक थी। मदहोशी में तलवार से राक्षस संहार का वो पल जब वो मुस्कुराया, दिल दहल गया। लगता है ये कैद उसकी मर्जी से ही हुई है। बैठा हुआ वो बुजुर्ग शायद उसके पिता हैं, पर नजरें सख्त क्यों हैं? ये नाटक किसी बड़े बदले की शुरुआत लगता है।
उस महिला का सफेद और नीला लिबास देखकर लगता है जैसे स्वर्ग से उतरी कोई अप्सरा हो, पर हाथ में तलवार और चेहरे पर गुस्सा बता रहा है कि वो खेलने नहीं आई है। जब वो खड़ी हुई, तो हवा में तनाव छा गया। मदहोशी में तलवार से राक्षस संहार में ऐसे दृश्य कम ही देखने को मिलते हैं जहाँ खूबसूरती और खतरा एक साथ हों। उसकी चुप्पी सबसे ज्यादा शोर मचा रही थी।
जैसे ही वो पंखा लेकर आया, माहौल बदल गया। उसकी चाल में एक अलग ही ठाठ था। लगता है वो इस सभा का असली मालिक है। बंदी युवक को देखकर उसकी मुस्कान में व्यंग्य था। मदहोशी में तलवार से राक्षस संहार की कहानी में ये किरदार सबसे ज्यादा रहस्यमयी लग रहा है। क्या वो दोस्त है या दुश्मन? उसकी हर हरकत संदेह पैदा करती है।
सामने रखे कोड़े और जलती आग देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ये सजा का इंतजाम है या कोई परीक्षा? बंदी युवक का डरा हुआ चेहरा असली लग रहा था, पर फिर अचानक उसका व्यवहार बदल गया। मदहोशी में तलवार से राक्षस संहार में ऐसे दृश्य दर्शकों को बांधे रखते हैं। वो बुजुर्ग जो आग के पास खड़ा था, शायद जल्लाद है। माहौल बहुत भारी था।
सिंहासन पर बैठे उस व्यक्ति की आँखों में गुस्सा और चिंता दोनों थी। जब वो खड़ा हुआ और चिल्लाया, तो लगा जैसे किसी पुराने दर्द को ताजा कर दिया हो। बंदी युवक शायद उसका बेटा है जिसने कोई गलती की है। मदहोशी में तलवार से राक्षस संहार में रिश्तों की ये जटिलता देखने लायक है। क्या वो माफ करेगा या सजा देगा? ये सवाल हर पल दिमाग में चल रहा था।