इस दृश्य में काली पोशाक पहनी रानी का व्यक्तित्व सबसे ज्यादा प्रभावशाली है। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक है जो बताती है कि वह सिर्फ सुंदर नहीं बल्कि खतरनाक भी है। जब वह युवक के चेहरे को छूती है, तो माहौल में एक अलग ही तनाव पैदा हो जाता है। मदहोशी में तलवार से राक्षस संहार जैसे दृश्यों की तुलना में यहाँ भावनाओं का खेल ज्यादा गहरा है। दर्शक के रूप में मैं इस रहस्यमयी महिला के इरादों को जानने के लिए बेताब हूँ।
नीली पोशाक वाला युवक इस पूरे नाटक का केंद्र बिंदु लगता है। वह एक तरफ सफेद पोशाक वाली महिला से जुड़ा हुआ है और दूसरी तरफ काली पोशाक वाली रानी के जादू में फंसता हुआ दिख रहा है। उसके चेहरे के हाव-भाव बता रहे हैं कि वह भ्रमित है। मदहोशी में तलवार से राक्षस संहार वाले एक्शन से हटकर यहाँ मनोवैज्ञानिक संघर्ष दिखाया गया है। उसकी यह दुविधा दर्शकों को बांधे रखती है कि वह अंत में किसका साथ देगा।
गंभीर माहौल में जब तीन सैनिक मक्का खाते हुए दिखाई दिए, तो यह दृश्य हल्का-फुल्का हो गया। यह हास्य का एक अच्छा प्रयास था जो तनाव को कम करता है। विशेष रूप से वह सैनिक जो मक्का खाते हुए भी चौंक जाता है, उसका अभिनय लाजवाब है। मदहोशी में तलवार से राक्षस संहार जैसे गंभीर पलों के बीच ऐसे छोटे-छोटे हास्य के टुकड़े कहानी को बोरिंग नहीं होने देते। यह दिखाता है कि निर्देशक ने हर पहलू का ध्यान रखा है।
सफेद पोशाक और फर कोट पहनी महिला का गुस्सा साफ झलक रहा है। जब वह युवक को खींचती है और उसे समझाती है, तो लगता है कि वह उसे किसी बड़ी मुसीबत से बचाना चाहती है। उसकी आँखों में चिंता और गुस्सा दोनों हैं। मदहोशी में तलवार से राक्षस संहार वाले संदर्भ में यह लगता है कि वह युवक को राक्षसों से लड़ने के लिए तैयार कर रही है, लेकिन युवक का ध्यान भटक रहा है। यह त्रिकोण प्रेम कहानी को और रोचक बना रहा है।
इस दृश्य का मंच सज्जा वाकई में शानदार है। पीछे का सुनहरा सिंहासन और बड़े स्तंभ राजसी ठाठ-बाठ को दर्शाते हैं। रोशनी का इस्तेमाल बहुत ही नाटकीय है जो पात्रों के चेहरों पर भावों को उभारता है। मदहोशी में तलवार से राक्षस संहार जैसे महाकाव्य दृश्यों के लिए ऐसा भव्य माहौल जरूरी होता है। हर कोने में सोने की नक्काशी और रंग-बिरंगे कालीन इस कहानी की भव्यता को बढ़ाते हैं। यह एक दृश्य उत्सव है।