इस दृश्य में भावनाओं का जो तूफान है वह देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जब वह लड़का गुलाब लेकर दूसरी लड़की के पास जाता है, तो सामने खड़ी लड़की की आँखों में जो दर्द और झटका दिखा, वह दिल को चीर गया। १०० बार अलविदा, पीछे नहीं हटना जैसे ही वह मुड़ती है, लगता है जैसे उसने अपने दिल को वहीं छोड़ दिया हो। यह सिर्फ एक प्रपोजल नहीं, बल्कि एक भावनात्मक युद्ध है जहाँ हर चेहरे की अभिव्यक्ति एक कहानी कह रही है।
पीछे खड़े तीनों दोस्तों की शारीरिक भाषा इस सीन को और भी ड्रामेटिक बना रही है। जब एक दोस्त गुलाब लेकर आगे बढ़ता है, तो बाकी दो के चेहरे पर जो उलझन और तनाव है, वह कमाल की है। खासकर वो लड़का जो धूसर सूट में है, उसकी नजरें सब कुछ देख रही हैं लेकिन चुप हैं। १०० बार अलविदा, पीछे नहीं हटना की कहानी में यह मोड़ बताता है कि दोस्ती और प्यार के बीच की लकीर कितनी पतली होती है।
दृश्य विरोधाभास इस सीन की जान है। हरी पोशाक वाली लड़की के हाथ में लाल गुलाब और सामने खड़ी गुलाबी पोशाक वाली लड़की का मासूम चेहरा। जब वह लड़का गुलाब देता है, तो हरी पोशाक वाली की मुस्कान और दूसरी की सिसकियाँ एक साथ देखना दर्दनाक है। १०० बार अलविदा, पीछे नहीं हटना में यह दृश्य साबित करता है कि कभी-कभी खुशी एक के चेहरे पर होती है और आँसू दूसरे की आँखों में।
इस पूरे सीन में संवाद से ज्यादा खामोशी बोल रही है। जब वह लड़की रोती है और कोई उसे सांत्वना नहीं देता, बस सब तमाशबीन बने रहते हैं, तो इंसानियत पर शक होता है। १०० बार अलविदा, पीछे नहीं हटना की यह कहानी हमें बताती है कि भीड़ में अकेलापन कैसा होता है। उस लड़के की आँखों में भी एक अजीब सी बेचैनी है, शायद वह भी कुछ कहना चाहता है लेकिन मजबूर है।
क्या वह लड़का सच में धोखा दे रहा है या यह सब किसी बड़ी योजना का हिस्सा है? जब वह गुलाब लेकर जाता है, तो उसकी आँखों में प्यार नहीं, बल्कि एक अजीब सी मजबूरी दिख रही है। १०० बार अलविदा, पीछे नहीं हटना के इस पल में लगता है कि शायद वह अपनी जान बचाने के लिए या किसी और की खातिर यह नाटक कर रहा है। पीछे खड़े दोस्तों की चिंतित नजरें इसी शक को पुष्टि करती हैं।