इस दृश्य में तनाव इतना गहरा है कि सांस लेना मुश्किल हो जाता है। लड़की के चेहरे पर डर और गुस्सा दोनों साफ दिख रहे हैं, जबकि लड़का अपनी बात मनवाने की कोशिश कर रहा है। मेज पर रखा ढेर सारा पैसा सिर्फ कागज नहीं, बल्कि उनके रिश्ते की कीमत लगता है। १०० बार अलविदा, पीछे नहीं हटना जैसी कहानियों में अक्सर पैसा ही खलनायक बन जाता है। यह दृश्य देखकर लगता है कि अब इनके बीच सब कुछ खत्म होने वाला है।
जब वह पुरानी यादों में खो जाता है, तो स्क्रीन पर एक अलग ही नमी छा जाती है। समारोह का वह दृश्य जहां वह दूसरी लड़की के साथ हंस रहा था, अब उसे ही काट रहा है। लड़की की आंखों में वह चमक नहीं है जो पहले हुआ करती थी। १०० बार अलविदा, पीछे नहीं हटना की विषय यहां बिल्कुल फिट बैठती है क्योंकि वह अपने ही किए कारनामों से भाग नहीं पा रहा। पछतावा और अपराधबोध का यह मिश्रण दर्शकों को बांधे रखता है।
लड़के का गुस्सा और चिल्लाना देखकर लगता है कि वह अपनी हार कबूल नहीं करना चाहता। लेकिन लड़की अब डरने वाली नहीं है, उसने पैसे उठाकर अपनी ताकत दिखा दी है। यह पल बहुत ही सशक्त है जहां पीड़ित अब शिकारी बन गई है। १०० बार अलविदा, पीछे नहीं हटना जैसे नाटक में ऐसे मोड़ ही कहानी को नई दिशा देते हैं। लाल पर्दे वाला पृष्ठभूमि इस गुस्से को और भी गहरा बना रहा है।
कभी-कभी शब्दों से ज्यादा खामोशी शोर मचाती है। जब वह लड़की चुपचाप खड़ी होकर उसे घूरती है, तो लगता है जैसे वह उसके दिमाग को पढ़ रही हो। लड़के की आंखों में वह आत्मविश्वास अब कहीं खो गया है। १०० बार अलविदा, पीछे नहीं हटना की कहानी में यह खामोशी सबसे बड़ा हथियार है। बिना कुछ बोले ही सब कुछ कह दिया गया है, जो कि एक बेहतरीन निर्देशन है।
समारोह के उस दृश्य में जब वह दूसरी लड़की के साथ था, तभी शायद यह सब शुरू हो गया था। अब उसी धोखे की बू इस कमरे में महक रही है। लड़की का धारीदार पोशाक पहनना और उसका अंदाज बताता है कि वह अब मासूम नहीं रही। १०० बार अलविदा, पीछे नहीं हटना में दिखाया गया यह धोखा हर किसी के दिल को छू लेता है। रिश्तों की यह कड़वी सच्चाई देखकर रूह कांप जाती है।