इस दृश्य में टिकट देखकर ही लग रहा था कि कुछ बड़ा होने वाला है। जब उसने वह कागज उठाया तो कमरे का माहौल एकदम बदल गया। दिन में दुश्मन, रात में पिया श्रृंखला में ऐसे मोड़ देखकर दिल धक से रह जाता है। उनकी आंखों में छिपा दर्द साफ झलक रहा था। आखिर वह कहां जाना चाहती थी? यह सवाल दिमाग में घूम रहा है। काश यह सफर अलग होता।
बिना कुछ बोले ही सब कुछ कह दिया इन दोनों ने। सोफे पर बैठते ही जो तनाव दिखा, वह असली लग रहा था। दिन में दुश्मन, रात में पिया की कहानी में यह पल सबसे भारी था। उसने धीरे से उसका हाथ थामा और सब ठीक हो गया। कभी कभी शब्दों की जरूरत नहीं होती, बस एक एहसास काफी होता है। बहुत खूबसूरत तरीके से दिखाया गया है यह पल।
अभिनेता की आंखों में जो नमी थी, वह दिल को छू गई। जब वह उसे देख रहा था, तो लग रहा था कि वह कुछ कहना चाहता है पर रुक रहा है। दिन में दुश्मन, रात में पिया में ऐसे दृश्य बार बार देखने को मिलते हैं जो रूह को झकझोर दें। प्रकाश व्यवस्था और पृष्ठभूमि संगीत ने इस दृश्य को और भी गहरा बना दिया है। सच में लाजवाब अभिनय देखने को मिला।
अंत में जब दोनों गले मिले, तो लगा जैसे सब बोझ उतर गया। इतनी देर तक जो दूरी थी, वह एक पल में मिट गई। दिन में दुश्मन, रात में पिया की इस कड़ी ने मुझे रुला दिया। रिश्तों में खटास तो आती है, पर प्यार जीत जाता है। यह दृश्य किसी को भी भावुक कर सकता है। बहुत ही दिल को छू लेने वाला अंत था इस दृश्य का।
शायद वह टिकट किसी नई शुरुआत का संकेत था। फर्श पर पड़ा वह कागज किसी अनकही कहानी जैसा लग रहा था। दिन में दुश्मन, रात में पिया में हर छोटी चीज का मतलब निकालना पड़ता है। उसने हिम्मत करके वह उठाया और सच्चाई सामने आई। कभी कभी छोटी चीजें बड़े फैसले लेती हैं। यह कहानी आगे क्या मोड़ लेगी, यह जानने की उत्सुकता बढ़ गई है।
बैठक कक्ष की सजावट बहुत आधुनिक थी, पर माहौल में ठंडक थी। जब वह पास आई तो गर्माहट लौट आई। दिन में दुश्मन, रात में पिया के मंच सजावट पर भी बहुत ध्यान दिया गया है। हर कोने से कहानी झलकती है। काले वेशभूषा और सफेद पोशाक का विरोधाभास भी बहुत गहरा संदेश दे रहा था। जैसे अंधेरा और उजाला साथ बैठे हों। बहुत बारीकी से बनाया गया है।
शुरू में जो दूरी थी, वह टूटे हुए विश्वास जैसी लग रही थी। उसकी नजरें झुकी हुई थीं और वह बेचैन था। दिन में दुश्मन, रात में पिया में रिश्तों की यह नाजुक डोर बहुत बारीकी से दिखाई गई है। जब उसने बात शुरू की, तो लगा अब सब खुलकर सामने आएगा। सच्चाई कड़वी हो सकती है, पर जरूरी होती है। यह पल बहुत यादगार बन गया है।
शायद उसने माफी मांगी थी या शायद उसने समझाया था। जो भी हुआ, अंत अच्छा हुआ। दिन में दुश्मन, रात में पिया की कहानी में यही तो खास है कि अंत हमेशा उम्मीद देता है। उसने उसके सिर पर हाथ रखा और सब ठीक हो गया। प्यार में अहंकार नहीं, समझदारी चाहिए। यह दृश्य हर किसी को सीख देता है कि रिश्ते निभाने कैसे हैं।
बिना संवाद के ही पूरी कहानी समझ आ गई। चेहरे के हाव भाव सब कुछ बता रहे थे। दिन में दुश्मन, रात में पिया में ऐसे दृश्य देखकर लगता है कि अभिनेता बहुत प्रतिभाशाली हैं। जब वह रोने वाली थी, तो उसने उसे संभाल लिया। यह सहजता पर्दे पर बहुत अच्छी लग रही थी। दर्शक भी इसमें खो जाता है कि आगे क्या होगा। बहुत ही शानदार प्रस्तुति है।
अंधेरे कमरे में भी उम्मीद की किरण दिखाई दी। जब दोनों पास आए, तो लगा सब ठीक हो जाएगा। दिन में दुश्मन, रात में पिया के इस दृश्य ने दिल को सुकून दिया। कभी कभी झगड़े होते हैं, पर प्यार बड़ा होता है। यह दृश्य देखकर अच्छा लगा कि अंत सकारात्मक था। ऐसे ही और दृश्य देखने को मिलें। बहुत प्यारा लगा यह पल।