सफेद कोट वाला लड़का बहुत शांत है। सामने दुश्मन खड़े हैं लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसे ही उसने हाथ हिलाया, सब हवा में उड़ गए। यह दृश्य देखकर रोंगटे खड़े हो गए। वैद्य भी, योद्धा भी में ऐसा युद्ध पहले नहीं देखा। उसकी आंखों में एक अलग ही चमक थी जब उसने दुश्मनों को हराया। सच में नायक का अंदाज निराला है और दर्शक इसे पसंद करेंगे।
चमड़े का कोट पहना गुंडा शुरू में बहुत बोल रहा था। लेकिन जब असली ताकत दिखाई दी, तो वह खंभे के पीछे छिप गया। उसकी आंखों में साफ डर दिख रहा था। हाथ जोड़कर माफ़ी मांगता हुआ देखकर हंसी आ गई। वैद्य भी, योद्धा भी की कहानी में ऐसा हास्य तत्व बहुत अच्छा लगा। कायरता की भी एक हद होती है भाई। खलनायक का डरना नायक की ताकत बताता है।
जब काली पोशाक वाले आदमी ने हमला किया, तो पर्दे पर आग जैसी चमक दिखी। यह विशेष प्रभाव लागत के हिसाब से काफी अच्छे हैं। हवा में उड़ने वाले करतब भी वास्तविक लग रहे थे। वैद्य भी, योद्धा भी में निर्माताओं ने युद्ध पर खासा ध्यान दिया है। हर दृश्य में ऊर्जा महसूस होती है। दर्शक बंधे रहते हैं अंत तक। तकनीकी पक्ष मजबूत है।
काले कपड़ों पर सुनहरा नाग बना था, यह रूप बहुत प्रभावशाली था। दोनों आदमी गंभीर लग रहे थे। लेकिन नायक के सामने उनकी एक नहीं चली। जमीन पर गिरते ही उनकी सारी इज्जत मिट्टी में मिल गई। वैद्य भी, योद्धा भी में खलनायक का प्रवेश भव्य था पर प्रस्थान शर्मनाक। पोशाक डिजाइनर की तारीफ करनी होगी। रूप बहुत दमदार था।
शुरू में लगा नायक अकेला पड़ गया है। चारों तरफ दुश्मन और बेहोश पड़े लोग। लेकिन फिर जो पलटा आया, वह शानदार था। नायक ने बिना पसीना बहाए सबको निपटा दिया। वैद्य भी, योद्धा भी की पटकथा में यह मोड़ बहुत जरूरी था। अब आगे क्या होगा, यह जानने की उत्सुकता बढ़ गई है। कहानी में दम है।
नायक के चेहरे पर मुस्कान थी लेकिन बातों में वजन था। खलनायक चिल्ला रहा था और नायक बस देख रहा था। यह विरोधाभास बहुत अच्छा बनाया गया है। वैद्य भी, योद्धा भी में संवाद प्रस्तुति पर ध्यान दिया गया है। बिना बोले ही नायक अपनी ताकत दिखा देता है। यह असली आत्मविश्वास है। अभिनय सराहनीय है।
आवासीय भवन के बाहर का रास्ता और सूखी घास, यह परिवेश वास्तविक लगता है। भीड़ भाड़ वाले शहर में शांत जगह पर संघर्ष हो रहा है। पीछे खड़ी गाड़ी और खंभे का इस्तेमाल युद्ध में अच्छे से हुआ। वैद्य भी, योद्धा भी में स्थान चुनने में समझदारी बरती गई है। माहौल थोड़ा उदास पर युद्ध तेज है। दृश्य सुंदर है।
शुरू के दृश्य भाग में कई लोग जमीन पर बेहोश पड़े थे। इससे अंदाजा हो गया कि नायक ने पहले ही सबको निपटा लिया है। यह पृष्ठभूमि विवरण कहानी को गहराई देती हैं। वैद्य भी, योद्धा भी में छोटी चीजों पर भी ध्यान दिया गया है। नायक की ताकत का अंदाजा इनसे ही लग जाता है। बहुत बढ़िया निर्देशन है। बारीकियों पर ध्यान।
खलनायक का चेहरा शुरू में गुस्से से लाल था। फिर धीरे धीरे उसका रंग उतर गया। जब वह घुटनों पर गिरा, तो उसकी मजबूरी साफ दिखी। वैद्य भी, योद्धा भी में भावनात्मक चित्रण बहुत अच्छा है। दर्शक को नायक की जीत पर खुशी होती है। यह बदलाव बहुत स्वाभाविक लगा। भावनाएं सही दिखाई गईं।
यह दृश्य देखकर पूरा चित्र देखने का मन किया। युद्ध, हास्य और नाटक सब कुछ है। नायक का प्रवेश और खलनायक की हार संतोषजनक लगी। वैद्य भी, योद्धा भी ने मेरी उम्मीदों पर खरा उतरा है। इस मंच पर ऐसी सामग्री मिलना अच्छा है। बिल्कुल बोरियत नहीं होती। मनोरंजन पूरा है।