इस दृश्य में जब काले कपड़े वाले पात्र को दादा जी का फोन आता है, तो माहौल में एक अजीब सी गंभीरता छा जाती है। वैद्य भी, योद्धा भी की कहानी में यह फोन कॉल किसी बड़ी साजिश की शुरुआत लगती है। चेहरे के भाव बता रहे हैं कि बातचीत साधारण नहीं है। परिवार के बीच छिपे राज धीरे-धीरे बाहर आ रहे हैं और दर्शक के रूप में हमें हर पल एक नया झटका मिल रहा है। यह सस्पेंस बनाए रखना आसान नहीं है और कहानी में गहराई है।
जब भूरे कपड़े वाले व्यक्ति ने इतने बड़े गुलाब का गुलदस्ता लेकर प्रवेश किया, तो सबकी नज़रें उसी पर टिक गईं। वैद्य भी, योद्धा भी के इस भाग में यह उपहार सिर्फ प्यार नहीं बल्कि ताकत का प्रतीक लग रहा है। गुलाब की पंखुड़ियों के बीच नोटों का होना दिखाता है कि यहाँ रिश्ते भी व्यापारिक हो सकते हैं। गुलदस्ता लाने वाले की हिम्मत और लेने वाली की चुप्पी दोनों ही कहानी को आगे बढ़ा रही हैं और रोमांच बढ़ा रही हैं।
खाने की मेज पर बैठे सभी पात्रों के चेहरे के भाव देखने लायक हैं। नीली पोशाक वाली युवती की नज़रें गुस्से से भरी हुई हैं जबकि गुलाब वाला व्यक्ति गर्व से खड़ा है। वैद्य भी, योद्धा भी में इस तरह के सामाजिक तनाव को बहुत बारीकी से दिखाया गया है। हर किसी के मन में कुछ चल रहा है जो शब्दों में नहीं बल्कि आँखों में दिख रहा है। यह जलन आगे चलकर बड़े संघर्ष का कारण बन सकती है और माहौल खराब कर सकती है।
फोन के पर्दे पर जब खाते में पैसे आने का संदेश आता है, तो कमरे में सन्नाटा छा जाता है। वैद्य भी, योद्धा भी की कहानी में पैसा एक बड़ा हथियार साबित हो रहा है। यह रकम साधारण नहीं है और इसने सभी के समीकरण बदल दिए हैं। जिसने यह भेजा है उसका इरादा साफ़ है कि वह अपनी ताकत दिखा रहा है। इस पल ने पूरी कहानी की दिशा बदल दी है और दर्शक हैरान रह गए हैं। यह धनराशि बहुत बड़ी है।
सफेद कोट पहने व्यक्ति का रवैया बहुत ही अलग और चुनौतीपूर्ण है। वह गुलाब वाले व्यक्ति को चुनौती दे रहा है और माहौल में तनाव बढ़ा रहा है। वैद्य भी, योद्धा भी में यह टकराव बहुत ही रोमांचक है। उसकी आँखों में गुस्सा और आत्मविश्वास दोनों साफ़ झलक रहे हैं। लगता है कि वह इस लड़की को लेकर बहुत गंभीर है और किसी भी कीमत पर अपनी बात मनवाना चाहता है। यह द्वंद्व बहुत गहरा है।
गुलाबी कपड़े वाली नायिका के चेहरे पर शर्म और हैरानी दोनों के भाव हैं। वह इस बड़े उपहार को लेकर सहज नहीं लग रही है। वैद्य भी, योद्धा भी में उसकी चुप्पी सबसे ज्यादा शोर मचा रही है। वह न तो उपहार ले रही है और न ही मना कर रही है। यह द्विधा उसकी स्थिति को बहुत जटिल बना रही है। दर्शक यह जानने के लिए बेताब हैं कि वह अंत में क्या फैसला लेगी और किसका साथ देगी। यह उलझन बढ़ रही है।
नीले रंग के कपड़े पहने पात्र का रवैया बहुत ही आक्रामक और ईर्ष्यालु है। वह गुलाबी कपड़े वाले के पास जाकर कुछ कहती है जो स्पष्ट रूप से विरोध है। वैद्य भी, योद्धा भी में यह पात्र नकारात्मक ऊर्जा का स्रोत बना हुआ है। उसकी बातों में चुभन है और उसकी नज़रों में नफरत साफ़ दिख रही है। यह झगड़ा अभी शुरू हुआ है और आगे चलकर यह और भी भयंकर रूप ले सकता है। माहौल गर्म है।
पूरा परिवार एक बड़ी गोल मेज पर इकट्ठा है लेकिन माहौल दोस्ताना नहीं लग रहा है। वैद्य भी, योद्धा भी में यह भोज का दृश्य एक युद्ध के मैदान जैसा है। हर कोई अपने मकसद के साथ बैठा है और खाना सिर्फ एक बहाना है। बड़े बुजुर्ग का फोन और फिर पैसे का लेनदेन बताता है कि यहाँ सब कुछ योजना के अनुसार हो रहा है। यह परिवारिक नाटक बहुत गहराई तक जाता है और रहस्यमयी है।
कमरे में हवा इतनी भारी है कि सांस लेना मुश्किल लग रहा है। वैद्य भी, योद्धा भी के निर्देशक ने तनाव को बहुत अच्छे से पकड़ा है। जब दो व्यक्ति आमने-सामने खड़े होते हैं, तो लगता है कि अब हाथापाई होगी। लेकिन शब्दों से ही एक-दूसरे को चोट पहुँचा रहे हैं। यह मानसिक युद्ध शारीरिक युद्ध से ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है और दर्शक इसमें खोए हुए हैं। यह दृश्य शानदार है।
भाग के अंत में जब फोन पर संदेश आता है, तो सबके होश उड़ जाते हैं। वैद्य भी, योद्धा भी की कहानी यहाँ आकर एक नया मोड़ लेती है। यह रकम किसने भेजी और क्यों, यह सवाल सबके मन में है। अगले भाग के लिए उत्सुकता बहुत बढ़ गई है। यह अधूरा अंत दर्शकों को बांधे रखने के लिए काफी है। अब देखना यह है कि इस पैसे का असर रिश्तों पर क्या पड़ता है। कहानी रोचक है।