इस नाटक का हर दृश्य बहुत ही गहराई से बनाया गया है और दर्शकों को बांधे रखता है। क्विपाओ पहनी पात्र की चुप्पी में जो ताकत है वह शब्दों से ज्यादा बोलती है। वैद्य भी, योद्धा भी की कहानी में यह मोड़ बहुत ही अप्रत्याशित लगा मुझे। कमरे की सजावट और पात्रों के कपड़े बहुत ही शानदार लग रहे हैं। यह दृश्य बताता है कि धन और शक्ति के बीच का संघर्ष कितना जटिल हो सकता है। हर पल नया मोड़ आता है।
बीज रंग का सूट पहने व्यक्ति की बेचैनी साफ झलक रही है उसके चेहरे पर। वह कुछ समझाने की कोशिश कर रहा है लेकिन सामने वाले का रवैया बहुत सख्त है। वैद्य भी, योद्धा भी में ऐसे परिवारिक कलह बहुत ही असली लगते हैं। मेज पर रखे खाने के पकवान और सोने के डिब्बे इस अमीरी को दर्शाते हैं। मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि कैसे एक दावत झगड़े में बदल गई। सब लोग चुप हैं।
सफेद जैकेट वाला युवक बहुत ही शांत खड़ा है और सब कुछ गौर से देख रहा है। उसकी आंखों में एक अलग ही प्रकार का गुस्सा और संदेह दिखाई दे रहा है। वैद्य भी, योद्धा भी की कहानी में यह किरदार बहुत ही रहस्यमयी लग रहा है। पीछे खड़ी अन्य पात्रों के चेहरे पर हैरानी साफ झलक रही है इस पूरे माहौल में। यह नाटक हमें समाज के ऊंचे वर्ग की असली तस्वीर दिखाता है। बहुत रोमांचक है।
लाल रंग के सजावटी सामान बता रहे हैं कि यह कोई त्योहार या खास मौका हो सकता है। लेकिन माहौल में तनाव इतना है कि सांस लेना भी मुश्किल लग रहा है। वैद्य भी, योद्धा भी के इस एपिसोड में भावनाओं का बहुत बड़ा खेल चल रहा है। काले रंग का डेनिम जैकेट वाला व्यक्ति भी इस झगड़े में शामिल हो गया है। मुझे यह जानने की उत्सुकता है कि आखिरकार सच्चाई क्या निकलकर आएगी।
पात्र के गले में पहना हुआ हार और कानों की बालियां बहुत ही कीमती लग रही हैं। उसकी पोशाक में लगा हुआ फूलों का डिजाइन बहुत ही बारीकी से किया गया है। वैद्य भी, योद्धा भी में किरदारों के लिबास पर बहुत ध्यान दिया गया है। जब वह व्यक्ति उसका हाथ पकड़ने की कोशिश करता है तो वह पीछे हट जाती है। यह छोटा सा इशारा बहुत बड़ी कहानी कह रहा है सबके लिए। बहुत सुंदर लगा।
इस कमरे की रोशनी और छत की डिजाइन बहुत ही आधुनिक और महंगी लग रही है। बड़ी गोल मेज के चारों ओर खड़े लोग एक दूसरे से कुछ छिपा रहे हैं। वैद्य भी, योद्धा भी की पटकथा में ऐसे मोड़ बहुत ही रोमांचक होते हैं। जब वह व्यक्ति चिल्लाता है तो सबकी नजरें उसी की तरफ मुड़ जाती हैं। यह नाटक दर्शकों को हर पल नया झटका देने में कामयाब रहा है। देखने में मजा आया।
दो पुरुषों के बीच की इस बहस में एक अजीब सी प्रतिद्वंद्विता साफ झलक रही है। एक शांत है तो दूसरा बहुत ही गुस्से में अपने हाथ हिला रहा है। वैद्य भी, योद्धा भी में ऐसे संवाद बहुत ही दमदार होते हैं। पीछे खड़ी नौकरानियां चुपचाप सब कुछ देख रही हैं बिना कुछ बोले। यह दृश्य बताता है कि ताकत का संतुलन कैसे पलक झपकते बदल सकता है। बहुत गहरा असर है।
पात्र के पेट को देखकर लग रहा है कि वह मां बनने वाली है और यह बात अहम है। इस वजह से ही शायद सब लोग इतने चिंतित और सावधान दिखाई दे रहे हैं। वैद्य भी, योद्धा भी की कहानी में यह तत्व बहुत ही भावुक कर देने वाला है। जब वह व्यक्ति अपनी बात रखता है तो उसकी आवाज में दर्द साफ सुनाई देता है। मुझे यह नाटक देखकर बहुत ही गहरा असर महसूस हुआ है। दिल को छू गया।
नीले रंग का सूट पहनी पात्र के चेहरे पर हैरानी और डर दोनों ही साफ झलक रहे हैं। वह अपने हाथों को आपस में मरोड़ रही है जो उसकी घबराहट को दिखाता है। वैद्य भी, योद्धा भी में हर किरदार की अपनी एक अलग पहचान है। कमरे में लगे चित्र और फूलों की सजावट बहुत ही सुंदर लग रही है। यह दृश्य हमें बताता है कि रिश्तों में दरारें कैसे पड़ जाती हैं। बहुत अच्छा बना है।
अंत में जब वह व्यक्ति दरवाजे की तरफ इशारा करता है तो माहौल और भी खराब हो जाता है। सब लोग स्तब्ध खड़े हैं और कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं। वैद्य भी, योद्धा भी का यह क्लाइमेक्स बहुत ही दमदार साबित हुआ है। मुझे अगले एपिसोड का बेसब्री से इंतजार है यह जानने के लिए। यह नाटक अपनी कहानी कहने के तरीके में बहुत ही अनोखा है। सबको देखना चाहिए।