इस नाटक अब मेरी बारी है में कार्यालय का वो सीन देखकर रोंगटे खड़े हो गए। सुनहरी कलम से साइन करते हुए मालिक की ठंडक और सामने बैठे तीनों लोगों का पसीना साफ दिखा रहा था। सत्ता के संतुलन को जिस तरह दिखाया गया है, वो कमाल का है। नेटशॉर्ट मंच पर देखने का अनुभव भी बहुत अच्छा रहा।
शौचालय में मूत्रालय साफ करता हुआ रसोइया देखकर दिल दहल गया। कल तक जो खाना बनाता था, आज वही गंदगी साफ कर रहा है। अब मेरी बारी है श्रृंखला में इस गिरावट को बहुत ही कच्चे रूप में दिखाया गया है। उसकी आंखों में आंसू और हाथों में खून देखकर बुरा लगा।
ऊपर कांच के कार्यालय में शराब पी रहा है और नीचे गंदे शौचालय में जान निकल रही है। अब मेरी बारी है की कहानी में यह अंतर बहुत गहराई से दिखाया गया है। अमीर और गरीब के बीच की खाई को इससे बेहतर तरीके से कोई नहीं दिखा सकता। सीन बहुत भावुक हैं।
अचानक इमारत के गिरने का सीन देखकर सांस रुक गई। इतनी शांति से चल रही कहानी में यह विनाश क्यों आया। अब मेरी बारी है में मोड़ की उम्मीद नहीं थी। धूल और मलबे के बीच जो खामोशी थी, वो चीख रही थी। संपादन और दृश्य प्रभावों ने जान डाल दी है।
काले लिबास में वो शख्स किसी मौत के फरिश्ते से कम नहीं लग रहा था। रसोइये के पैर पकड़ने पर भी उसका चेहरा नहीं पसीजा। अब मेरी बारी है में खलनायक का प्रवेश शानदार है। उसकी आंखों में कोई रहम नहीं था, बस काम पूरा करने की जल्दी थी। डरावना किरदार है।
कागज पर लिखा था खाद्य और पेय उद्योग पर प्रतिबंध। यह सिर्फ एक आदेश नहीं, किसी की जिंदगी खत्म करने जैसा था। अब मेरी बारी है में कागजों की ताकत को दिखाया गया है। दस्तखत होते ही सब खत्म हो गया। व्यापारिक दुनिया की क्रूरता सामने है।
सी फॉग समूह की ऊपरी मंजिल से शहर का नज़ारा और हाथ में शराब का गिलास। जीत का जश्न मना रहा है वो शख्स। अब मेरी बारी है के अंत में यह सीन संतोष और बदले की आग दोनों दिखाता है। नीचे तबाही और ऊपर सुकून, यह कैसी दुनिया है।
रसोइये के हाथ जब उस आदमी के पैरों को पकड़ते हैं, तो इंसानियत शर्मिंदा हो जाती है। खून से सने हाथ और गिड़गिड़ाती आवाज। अब मेरी बारी है में इस सीन ने रुला दिया। किसी को भी इतना गिरा हुआ नहीं देखना चाहिए। बहुत हृदयस्पर्शी और दुखद दृश्य है।
शुरुआत शांत कार्यालय से होती है और अंत तबाही पर होता है। अब मेरी बारी है की रफ़्तार कभी धीमी नहीं हुई। हर सीन के बाद कुछ नया होता है। दर्शक को बांधे रखने की कला इसमें है। नेटशॉर्ट पर लगातार देखने का मन करता है। मज़ा आ गया।
यह कहानी सिर्फ व्यापार की नहीं, बदले की है। जो ऊपर था वो नीचे आ गया और जो नीचे था वो ऊपर चला गया। अब मेरी बारी है का शीर्षक सही है। हर किरदार की नियति लिखी हुई थी। अंत देखकर मन में कई सवाल छोड़ गया यह नाटक।
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