जब सफेद पोशाक पहने उस व्यक्ति ने अपनी हथेली से सुनहरी रोशनी निकाली, तो मेरी रूह कांप गई! वह चुपचाप खड़ा था लेकिन उसकी शक्तियां किसी देवता से कम नहीं लग रही थीं। बदला जो रोका नहीं में ऐसे दृश्य देखकर लगता है कि कहानी में बहुत बड़ा ट्विस्ट आने वाला है। बूढ़े आदमी का डरना और जमीन पर गिर जाना साबित करता है कि वह जादू साधारण नहीं था।
लाल साड़ी पहनी वह महिला जमीन पर बैठी थी लेकिन उसकी आंखों में जो आग थी, वह किसी भी खड़े इंसान से ज्यादा खतरनाक लग रही थी। बदला जो रोका नहीं के इस सीन में ऐसा लगा जैसे वह बदला लेने की कसम खा रही हो। उसके चेहरे के भाव और हाथों की मुद्रा बता रहे थे कि वह हारी नहीं है, बस मौका ढूंढ रही है।
पीली पोशाक वाली नायिका शुरू में डरी हुई लग रही थी लेकिन अंत में जब वह महल जैसे कमरे में खड़ी हुई, तो उसका रूतबा बदल चुका था। बदला जो रोका नहीं में उसका किरदार बहुत गहराई से लिखा गया है। मोमबत्तियों की रोशनी में उसका चेहरा और भी खूबसूरत लग रहा था, जैसे वह किसी बड़ी जिम्मेदारी को संभालने के लिए तैयार हो गई हो।
शुरुआत में वह बूढ़ा आदमी कितना घमंडी लग रहा था, लेकिन जब सुनहरी रोशनी ने उसे घेर लिया, तो उसका सारा अहंकार धूल में मिल गया। बदला जो रोका नहीं में यह दृश्य बहुत ही संतोषजनक था। उसका जमीन पर गिरना और दर्द से कराहना दिखाता है कि शक्तिशाली लोगों के सामने घमंड करना कितना खतरनाक हो सकता है।
उस युवक के हाथ में जो सुनहरा मुखौटा था, वह सिर्फ एक प्रॉप नहीं लग रहा था। बदला जो रोका नहीं में यह किसी बड़े राज की कुंजी हो सकती है। वह उसे ऐसे पकड़े हुए था जैसे वह उसकी पहचान का हिस्सा हो। शायद वह मुखौटा पहनकर कोई दूसरा रूप धारण करता होगा, यह सोचकर ही रोमांच हो रहा है।