इस दृश्य में तनाव इतना गहरा है कि सांस लेना मुश्किल हो जाता है। जब वह कागजात पर हस्ताक्षर करता है, तो लगता है जैसे किसी रिश्ते की मौत हो रही हो। बच्ची का मासूम चेहरा और महिला की बेचैनी दिल को छू लेती है। छोटी परी जो समझे पशु भाषा जैसी कहानियों में भी इतना दर्द नहीं होता जितना इस अमीर घर के दरवाजों के पीछे छिपा है। काश ये लोग अपनी दौलत से ज्यादा इंसानियत को अहमियत देते।
लग्जरी सोफे और क्रिस्टल झूमर के नीचे चल रहा ये ड्रामा किसी ट्रैजडी से कम नहीं है। सूट पहने वो शख्स कितना ठंडा दिख रहा है, जैसे उसके अंदर कोई इमोशन ही न बचा हो। सामने खड़ी महिला की आंखों में जो डर है, वो किसी भी डायलॉग से ज्यादा बोल रहा है। छोटी परी जो समझे पशु भाषा वाली कहानियां सुनकर हम बड़े हुए हैं, पर असल जिंदगी में जानवरों से ज्यादा इंसानों की भाषा समझना मुश्किल होता है।
जब एक बाप अपने बच्चे के सामने कागजात पर साइन करता है, तो वो सिर्फ स्याही नहीं बहा रहा, वो अपने वादों को मिटा रहा है। उस नन्ही परी का चेहरा देखकर लगता है कि उसकी दुनिया अभी टूट गई है। अमीरी के इस चमकते घर में सुकून की जगह सिर्फ पावर डायनामिक्स हैं। छोटी परी जो समझे पशु भाषा वाली कहानियों में जानवर वफादार होते हैं, यहाँ इंसान ही गद्दार निकले। ये सीन देखकर रूह कांप गई।
कमरे में इतनी खामोशी है कि दीवारों से टकराकर वापस आ रही है। कोई चीख नहीं, कोई शोर नहीं, बस कागजात सरकने की आवाज और टूटे हुए दिलों की धड़कन। वो औरत जो कुछ कहना चाहती है पर शब्द गले में अटक गए हैं। छोटी परी जो समझे पशु भाषा वाली दुनिया में कम से कम प्यार तो मिलता था, यहाँ तो इंसानियत भी बिक गई है। ये दृश्य बताता है कि पैसा सब कुछ खरीद सकता है, सिवाय सुकून के।
महंगे सूट पहने ये लोग कितने अमीर लग रहे हैं, पर इनकी आत्मा कितनी गरीब है। वो शख्स जो कागजात थामे खड़ा है, उसके चेहरे पर कोई पछतावा नहीं, बस एक अजीब सी जिद्द है। सामने खड़ी बच्ची की मासूमियत इस क्रूर दुनिया के सामने बेबस लग रही है। छोटी परी जो समझे पशु भाषा वाली कहानियां हमें सिखाती हैं कि प्यार भाषा से ऊपर होता है, पर यहाँ तो प्यार की कोई भाषा ही नहीं बची।