रेस्तरां में दो परिवारों के प्रवेश ने माहौल बदल दिया। एक तरफ सादगी और प्यार, दूसरी तरफ दिखावा और घमंड। राजेंद्र और सरला की अमीरी सिर्फ कपड़ों तक सीमित लगती है, जबकि दूसरे पिता की सादगी में असली गरिमा है। छोटी परी जो समझे पशु भाषा वाली कहानी में यह वर्ग अंतर बहुत गहराई से दिखाया गया है। बच्चों के चेहरे पर साफ दिख रहा है कि उन्हें किस माहौल में सुकून मिलता है।
वीडियो देखकर लगा कि बच्चे सबसे बड़े जज होते हैं। सफेद गाउन वाली बच्ची के पास सब कुछ है, फिर भी उसकी आंखों में वो चमक नहीं जो सादी नीली पोशाक वाली बच्ची की आंखों में है। जब दोनों परिवार आमने-सामने आए, तो माहौल में जो तनाव था वो लाजवाब था। छोटी परी जो समझे पशु भाषा वाले कथानक में यह दिखाया गया है कि असली खुशी चीजों में नहीं, रिश्तों में होती है। नेटशॉर्ट पर ऐसी सामग्री देखना सुकून देता है।
सरला की पोशाक और आभूषण देखकर लगा कि वह सबको नीचा दिखाना चाहती हैं, लेकिन जब उनकी नजर उस मेज पर पड़ी जहां दूसरा परिवार बैठा था, तो उनके चेहरे के भाव बदल गए। राजेंद्र की मुस्कान में भी एक अजीब सी बेचैनी थी। छोटी परी जो समझे पशु भाषा वाली श्रृंखला में यह बिना संवाद वाली अभिनय कमाल की है। बिना कुछ बोले ही कहानी आगे बढ़ रही है और दर्शक कनेक्ट महसूस कर रहे हैं।
काले सूट वाले पिता का अपनी बेटी के प्रति व्यवहार देखकर दिल पिघल गया। वह न केवल उसका हाथ थामे चल रहे हैं, बल्कि मेनू देखते वक्त भी उसकी राय ले रहे हैं। वहीं राजेंद्र अपनी बेटी को सिर्फ अपनी हैसियत दिखाने का जरिया बना रहे हैं। छोटी परी जो समझे पशु भाषा वाली कहानी में यह विपर्यास बहुत बारीकी से दिखाया गया है। असली अमीरी जेब में नहीं, दिल में होती है, यह संदेश बहुत प्यारा लगा।
आलीशान रेस्तरां के परिवेश ने इस कहानी को और भी दिलचस्प बना दिया है। जब सरला और राजेंद्र प्रवेश करते हैं, तो कैमरा कोण और पृष्ठभूमि संगीत सब कुछ बता देता है कि अब कुछ बड़ा होने वाला है। छोटी परी जो समझे पशु भाषा वाले प्रकरण में यह दृश्य सबसे खास है। दो अलग-अलग सोच वाले लोग एक ही जगह पर, यह टकराव देखने लायक है। नेटशॉर्ट ऐप पर ऐसे दृश्य बार-बार देखने को मन करता है।