जब तक फूल न झर जाएँ में राजा का चेहरा देखकर दिल दहल गया। बच्चों की चीखें, माँ का रोना, और वो लकड़ी का उपकरण... सब कुछ इतना वास्तविक लगा कि साँस रुक गई। राजा की आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरा दर्द था — जैसे वो खुद भी इस दर्द से गुज़र रहे हों। दृश्य की तीव्रता और अभिनेताओं की भावनाएँ इतनी सच्ची थीं कि लगता है जैसे मैं भी उस दरबार में खड़ा हूँ।