१५ साल बाद का यह दृश्य दिल को छू लेता है। अरुण अभी भी वही लॉलीपॉप वाला बच्चा है, जबकि राधा अब एक गंभीर योद्धा बन गई है। जब वह अरुण को डांटती है, तो लगता है कि बचपन की वो मित्रता अब जिम्मेदारी में बदल गई है। योद्धा का बदला में ऐसे भावनात्मक पल ही कहानी की जान हैं। अरुण का भ्रमित चेहरा देखकर हंसी भी आती है और तरस भी।
मोर जब दो बड़े पत्थर उठाती है, तो पर्दे के सामने बैठे सबकी सांसें रुक जाती हैं। उसकी मांसपेशियां और केंद्रित भाव देखकर लगता है कि वह किसी महायोद्धा से कम नहीं है। अरुण का उसकी बांह को छूना और फिर डर जाना, यह हास्य समय बेहतरीन है। योद्धा का बदला में साहसिक दृश्य और हास्य का यह मिश्रण दर्शकों को बांधे रखता है। मोर का किरदार सच में प्रेरणादायक है।
जब सभी छात्र एक साथ मुक्केबाजी करते हैं, तो उस तालमेल और ऊर्जा को देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सर्प और बाघ जैसे किरदारों का प्रवेश धमाकेदार है। राधा का खड़ा होकर सबको देखना यह दर्शाता है कि वह कितनी सख्त प्रशिक्षक हैं। योद्धा का बदला में प्रशिक्षण दृश्य इतने यथार्थवादी हैं कि लगता है हम भी उस अखाड़े में मौजूद हैं। हर गति में शक्ति है।
अरुण का अचानक सिर पकड़कर चिल्लाना और दर्द में तड़पना यह संकेत देता है कि कहानी में कोई बड़ा मोड़ आने वाला है। शायद उसे कोई पुरानी याद आ गई हो या कोई शक्ति जागृत हो रही हो। यह दृश्य दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देता है कि आखिर हुआ क्या? योद्धा का बदला में रहस्य बनाए रखने का यह तरीका बहुत ही शानदार है। अरुण के अभिनय ने इस दृश्य को और भी तीव्र बना दिया।
राधा का सफेद पोशाक में खड़ा होना और छात्रों को निहारना यह दिखाता है कि वह कितनी अनुशासनप्रिय हैं। जब वह अरुण को डांटती हैं, तो लगता है कि वह सिर्फ एक शिक्षक नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक भी हैं। योद्धा का बदला में राधा का किरदार महिला सशक्तिकरण का प्रतीक है। उसकी आंखों में जो गंभीरता है, वह बताती है कि वह अपने लक्ष्य के प्रति कितनी समर्पित हैं।