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योद्धा का बदलावां59एपिसोड

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योद्धा का बदला

अरुण का परिवार मारा गया, वह गिरकर याददाश्त खो बैठा और राधा के अखाड़े में पला। पंद्रह साल बाद उसने देशद्रोही राकेश को हराया, अपनी असली पहचान बताई। राधा ने काला ताबीज़ की विद्या सीखी। अरुण ने दुश्मनों को मात देकर षड्यंत्र खोला। आखिर में दोनों ने सरगना को मार गिराया। सबने अरुण को संघ का अध्यक्ष चुन लिया।
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इस एपिसोड की समीक्षा

लाल कालीन पर खून का रंग

जब वह गंजा योद्धा तलवार लेकर दौड़ा, तो लगा कि जीत उसी की होगी। लेकिन नीली पोशाक वाले ने जो पलटवार किया, वह देखकर रोंगटे खड़े हो गए। योद्धा का बदला की यह लड़ाई सिर्फ ताकत की नहीं, बल्कि दिमाग की भी थी। खून गिरने के बाद भी उसकी हंसी ने सबको चौंका दिया। क्या यह पागलपन है या कोई गहरी चाल? हर फ्रेम में तनाव और ड्रामा है जो आपको बांधे रखता है।

हार के बाद की मुस्कान

आमतौर पर हारने वाला रोता है, लेकिन यहाँ तो गंदा सा चेहरा लेकर भी वह मुस्कुरा रहा था। यह दृश्य बताता है कि योद्धा का बदला में जीत और हार की परिभाषा अलग है। दर्शकों की चीखें और वह खूनी मुस्कान मन में एक अजीब सी बेचैनी पैदा करती है। शायद वह जानता था कि असली खेल तो अब शुरू होगा। एक्टिंग इतनी दमदार है कि आप स्क्रीन से आंखें नहीं हटा पाते।

भीड़ का गुस्सा और खामोशी

जब गंजा योद्धा जमीन पर गिरा, तो भीड़ का रवैया एकदम बदल गया। पहले जो तालियां बज रही थीं, अब वहां सिर्फ गुस्सा और नफरत दिखाई दी। योद्धा का बदला के इस सीन में भीड़ का रिएक्शन ही असली हीरो है। एक आदमी का खून देखकर कैसे सबके चेहरे बदल जाते हैं, यह देखना रोंगटे खड़े करने वाला है। यह सिर्फ एक फाइट नहीं, एक सामाजिक क्रांति का संकेत लग रहा है।

नीली पोशाक वाला योद्धा

उसकी आंखों में जो ठंडक थी, वह किसी भी तलवार से ज्यादा खतरनाक थी। जब उसने वार किया, तो लगा जैसे समय थम गया हो। योद्धा का बदला में इस किरदार ने साबित कर दिया कि असली ताकत शोर में नहीं, खामोशी में होती है। उसका हर मूव परफेक्ट था, जैसे वह पहले से जानता हो कि दुश्मन क्या करेगा। ऐसे किरदार ही कहानी को यादगार बनाते हैं।

खून से सनी दाढ़ी

जब वह गिरा और उसके मुंह से खून निकला, तो उसने उसे पोंछने के बजाय मुस्कुरा कर दिखाया। यह दृश्य योद्धा का बदला का सबसे हैरान करने वाला पल था। क्या वह दर्द महसूस नहीं कर रहा था? या फिर यह उसकी जीत का जश्न था? एक्टर ने इस किरदार में जो पागलपन भरा है, वह काबिले तारीफ है। ऐसे विलेन यादगार बन जाते हैं जो हारकर भी जीतते हैं।

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