जब उसने वह काला कार्ड दिया, तो लगा जैसे कोई बड़ा खेल शुरू होने वाला हो। लड़की की आँखों में चमक और फिर दूरभाष पर बात करना, सब कुछ इतना रोमांच से भरा है कि साँस रुक जाए। प्रतिशोध की डोर में ऐसे मोड़ ही तो दर्शकों को बांधे रखते हैं। बाग़ीचे का माहौल और उन दोनों के बीच की खामोशी, सब कुछ कहानी का हिस्सा लगता है।
भोजन कक्ष की मेज पर बैठे उस बुजुर्ग व्यक्ति के चेहरे पर जो गंभीरता थी, वह सब कुछ बता रही थी। खड़ी लड़की और बैठी महिला के बीच का तनाव साफ़ झलक रहा था। जब वह नई लड़की सफेद पोशाक में आई, तो माहौल और भी भारी हो गया। प्रतिशोध की डोर में परिवारिक राजनीति को जिस तरह दिखाया गया है, वह दिलचस्प है।
उसकी एंट्री ने सबका ध्यान खींच लिया। सफेद पोशाक, सादा सजावट, लेकिन आँखों में एक अलग ही चमक। जब वह मेज पर बैठती है, तो बुजुर्ग व्यक्ति की प्रतिक्रिया देखने लायक होती है। लगता है जैसे वह किसी बड़ी योजना का हिस्सा हो। प्रतिशोध की डोर की इस कड़ी में उसका किरदार सबसे ज्यादा प्रभावशाली लगा।
पहले कार्ड दिया, फिर दूरभाष पर बात की। ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी से संपर्क करके कोई बड़ा फैसला ले रही हो। उसके चेहरे के भाव बदलते रहे, जो कहानी की गहराई को दिखाते हैं। प्रतिशोध की डोर में ऐसे छोटे-छोटे विवरण ही कहानी को आगे बढ़ाते हैं। बाग़ीचे से लेकर घर के अंदर तक का सफर बहुत सुचारू है।
उसकी आँखों में जो डर और चिंता थी, वह साफ़ दिख रही थी। जब वह लड़की सामने आई, तो उसका चेहरा और भी सख्त हो गया। लगता है जैसे वह उसे पहचानता हो या फिर उससे कोई पुरानी दुश्मनी हो। प्रतिशोध की डोर में ऐसे किरदार ही कहानी को नया मोड़ देते हैं। उसकी हरकतें देखकर लगता है कि वह कुछ छिपा रहा है।