सफेद पोशाक पहनी लड़की की आँखों में जो ठंडक है, वो किसी भी चीख से ज्यादा डरावनी है। जब वह बिना पलक झपकाए सामने खड़े लोगों को देखती है, तो लगता है जैसे वह किसी बड़े बदले की योजना बना रही हो। प्रतिशोध की डोर में यह दृश्य बताता है कि असली ताकत शोर में नहीं, बल्कि खामोशी में होती है। उसकी मुस्कान के पीछे छिपा दर्द साफ दिख रहा है।
काली साड़ी और छोटी ड्रेस पहनी दोनों महिलाओं के चेहरे पर जो डर और हैरानी है, वह सब कुछ बता देती है। वे जिस आदमी के पीछे खड़ी हैं, उसकी सत्ता अब खतरे में लग रही है। उनकी पकड़ ढीली पड़ रही है और वे इसे महसूस कर रही हैं। प्रतिशोध की डोर के इस मोड़ पर लगता है कि अब शिकारी ही शिकार बनने वाला है। माहौल में तनाव साफ झलक रहा है।
जिस आदमी को हमेशा सब डरते थे, आज उसकी आँखों में पहली बार शक और डर दिख रहा है। उसकी दाढ़ी और सूट उसकी ताकत का प्रतीक थे, लेकिन अब वह सफेद पोशाक वाली लड़की के सामने बेबस लग रहा है। उसका चेहरा बता रहा है कि उसे अपनी गलती का अहसास हो गया है। प्रतिशोध की डोर में यह पल सबसे महत्वपूर्ण है जहाँ ताकत का संतुलन बदल रहा है।
यह कोई आम ऑफिस नहीं, बल्कि एक युद्ध का मैदान बन चुका है। चारों तरफ की खामोशी और लोगों की नज़रें बता रही हैं कि यहाँ कुछ बहुत बड़ा होने वाला है। कांच की दीवारें और ठंडी रोशनी इस तनाव को और बढ़ा रही हैं। प्रतिशोध की डोर में यह सेटिंग बहुत ही बेहतरीन है जो कहानी के गंभीर पहलू को उजागर करती है। हर कोई सांस रोके इस नाटक को देख रहा है।
बुजुर्ग महिला के गले में मोतियों की माला और हाथ में महंगा बैग है, लेकिन उसकी आँखों में जो घबराहट है, वह उसकी सारी शान को फीका कर देती है। वह जिस लड़की को नीचा दिखाना चाहती थी, आज वही लड़की उसके सामने खड़ी है। प्रतिशोध की डोर में यह विडंबना बहुत अच्छे से दिखाई गई है कि पैसा और शोहरत हमेशा काम नहीं आते। उसका चेहरा पीला पड़ गया है।