शुरुआत में ही कार के अंदर बैठे नायक के चेहरे पर जो गहरा दर्द और उदासी दिखी, वह दिल को छू गई। लगता है जैसे वह किसी बड़े धोखे की ओर बढ़ रहा हो। प्रतिशोध की डोर की शुरुआत इतनी भावनात्मक हो, यह उम्मीद से परे है। ड्राइवर की चुप्पी और पीछे बैठे शख्स की बेचैनी कहानी के तनाव को बढ़ाती है।
जब पत्रकारों का झुंड होटल के कमरे में घुसता है, तो सन्नाटा टूट जाता है। बिस्तर पर बैठे जोड़े की घबराहट साफ दिख रही थी। यह दृश्य इतना तीव्र था कि सांस रुक सी गई। प्रतिशोध की डोर में ऐसे मोड़ आते रहेंगे, यह तो तय है। कैमरे की फ्लैश लाइट्स और चीखें माहौल को और भी डरावना बना देती हैं।
वह महिला जो सुनहरी साड़ी में अकेले बैठी चाय पी रही थी, उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। लगता है वह सब कुछ जानती है। प्रतिशोध की डोर के इस पात्र के पीछे कोई बड़ी साजिश छिपी हो सकती है। उसकी आंखों में छिपा दर्द और मुस्कान के पीछे का मतलब समझना मुश्किल है।
जब नायक और वह महिला एक-दूसरे को गले लगाते हैं, तो लगता है जैसे समय थम गया हो। उनकी आंखों में जो भावनाएं थीं, वे शब्दों से परे हैं। प्रतिशोध की डोर के इस दृश्य ने दिल को छू लिया। यह प्यार है या बदले की शुरुआत? कुछ भी हो, यह पल यादगार बन गया।
काले कोट में चमकदार कंधे वाला नायक जब कमरे में घुसता है, तो उसकी आंखों में गुस्सा और दर्द दोनों दिखते हैं। वह सब कुछ देख रहा है, लेकिन चुप है। प्रतिशोध की डोर का यह किरदार इतना जटिल क्यों है? उसकी चुप्पी शोर मचा रही है। लगता है वह किसी बड़े फैसले के कगार पर है।