शंघाई की रात के बाद सुबह का दृश्य बहुत ही अजीब है। जब वह नींद से जागती है और उसे पता चलता है कि वह अकेली नहीं है, तो उसका चेहरा देखने लायक होता है। प्रतिशोध की डोर में ऐसे मोड़ आते हैं जो दर्शक को बांधे रखते हैं। उसकी घबराहट और उसकी शांति के बीच का तनाव कमाल का है।
होटल के कमरे की रोशनी और सफेद चादरों के बीच जो खामोशी है, वह चीख रही है। दोनों के बीच की दूरी और नज़दीकियां एक साथ महसूस हो रही हैं। प्रतिशोध की डोर की कहानी में यह पल बहुत महत्वपूर्ण है जहां शब्दों की जरूरत नहीं, बस आंखों का खेल काफी है। हर फ्रेम में एक नया सवाल खड़ा होता है।
जब वह बिस्तर पर उठकर बैठती है और चादर को पकड़ती है, तो उसकी आंखों में डर और हैरानी दोनों साफ दिख रहे हैं। वहीं वह लड़का सोफे पर इतना शांत बैठा है जैसे कुछ हुआ ही न हो। प्रतिशोध की डोर में यही विरोधाभास कहानी को आगे बढ़ाता है। कौन गलत है और कौन सही, यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है।
परदे से छनकर आती धूप और बिस्तर पर बिखरी चादरें इस दृश्य को एक अलग ही अहसास दे रही हैं। वह लड़की जब होश में आती है तो उसकी सांसें तेज हो जाती हैं। प्रतिशोध की डोर के इस हिस्से में जो रहस्य है, वह दर्शक को अंत तक बांधे रखता है। क्या यह सब एक साजिश थी या सिर्फ एक गलतफहमी?
इस दृश्य में संवाद कम हैं लेकिन आंखों की भाषा बहुत कुछ कह रही है। जब वह लड़का उसकी तरफ देखता है और वह घबरा जाती है, तो लगता है जैसे समय थम गया हो। प्रतिशोध की डोर में ऐसे पल आते हैं जो दिल पर गहरा असर छोड़ते हैं। हर नज़र में एक सवाल और हर खामोशी में एक जवाब छिपा है।